हजारीबाग जिले के कई वन क्षेत्रों में गिद्धों की गतिविधियां बढ़ती दिखाई दे रही हैं। महावर पहाड़ से लेकर कपका, कुरचुनो और बेड़ो पुल के आसपास इनके झुंड देखे गए हैं। वयस्क गिद्धों के साथ कम उम्र के पक्षियों की मौजूदगी को वन्यजीव संरक्षण और स्थानीय पारिस्थितिकी के लिए उत्साहजनक संकेत माना जा रहा है।
हजारीबाग को अस्थायी रूप से गिद्धों का सुरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया है। देश में मिलने वाली नौ प्रजातियों में से पांच प्रजातियां यहां दर्ज की गई हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इनमें तीन प्रजातियां इस इलाके में अस्थायी रूप से रहती हैं, जबकि दो प्रवास के दौरान हजारीबाग पहुंचती हैं।
वन क्षेत्र पदाधिकारी वन प्रकाश के मुताबिक, विभाग की निगरानी में पिछले कुछ दिनों के दौरान जंगल के विभिन्न हिस्सों में गिद्धों की सक्रियता बढ़ी है। छोटे और कम उम्र के गिद्धों का दिखना इस संभावना को मजबूत करता है कि आसपास उनके प्रजनन स्थल हो सकते हैं। हालांकि, इसकी पुष्टि के लिए आगे की निगरानी महत्वपूर्ण होगी।
महावर पहाड़ को गिद्धों के पुराने ठिकानों में गिना जाता है। पहाड़ी और उससे सटा जंगल इन पक्षियों को भोजन के साथ बैठने और रहने की जगह उपलब्ध कराता है। यदि सुरक्षित परिस्थितियां बनी रहती हैं, तो बरकट्ठा क्षेत्र में भी आने वाले वर्षों में उनकी संख्या बढ़ने की उम्मीद जताई गई है।
पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, डाइक्लोफेनाक पर रोक, जागरूकता अभियानों और सुरक्षित प्राकृतिक आवास ने गिद्धों की वापसी में भूमिका निभाई है। राज्य में इनकी आबादी अब लगभग 450 से 500 होने का अनुमान बताया गया है। दूसरी ओर, डाइक्लोफेनाक समेत पशुओं के उपचार में इस्तेमाल होने वाली कुछ दवाओं के अवशेष गिद्धों के लिए घातक माने जाते हैं। जंगलों और प्राकृतिक भोजन स्रोतों में कमी भी उनके अस्तित्व को प्रभावित करती है।
गिद्ध मृत पशुओं के अवशेष खाकर जंगल और खुले क्षेत्रों की प्राकृतिक सफाई में योगदान देते हैं। इससे शवों के सड़ने और संक्रमण फैलने का जोखिम कम होता है। इसी कारण इनकी बढ़ती मौजूदगी को केवल एक पक्षी प्रजाति की वापसी नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिक तंत्र की स्थिति से जुड़ा सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।