झारखंड हाईकोर्ट ने वर्ष 1986 के पलामू हत्या मामले में तीन दोषियों की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी है। अदालत ने महागु यादव, बिंदेश्वर दुसाध और अखिलेश सिंह की दोषसिद्धि में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। वहीं, रामरेखा यादव को संदेह का लाभ देते हुए उसकी दोषसिद्धि और सजा रद्द कर दी गई।
जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने आपराधिक अपील पर यह आदेश दिया। मामला वर्ष 2000 से हाईकोर्ट में लंबित था। रामरेखा यादव के संबंध में अदालत ने कहा कि केवल एक गवाह की पहचान के आधार पर उसे दोषी ठहराना सुरक्षित नहीं है।
यह प्रकरण तत्कालीन डालटनगंज जिले में 28 अगस्त 1986 की रात रामविलास दुसाध की हत्या से जुड़ा है। अभियोजन का कहना था कि कुछ लोग बातचीत के बहाने उन्हें घर से अपने साथ ले गए थे। वह वापस नहीं लौटे और अगले दिन उनका शव बरामद हुआ था।
मामले में हत्या का कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं था। हालांकि, कई गवाहों ने रामविलास को आरोपियों के साथ जाते देखने की बात कही थी। हाईकोर्ट ने इसे परिस्थितिजन्य साक्ष्य की महत्वपूर्ण कड़ी माना। अदालत ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट को भी साक्ष्यों के आकलन में अहम माना।
पुलिस ने इस मामले में 25 लोगों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया था। निचली अदालत में 19 आरोपियों के विरुद्ध सुनवाई हुई, जिनमें 12 को संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया गया था और सात को दोषी ठहराया गया था। हाईकोर्ट के समक्ष दायर अपील में चार लोगों की दोषसिद्धि पर विचार हुआ।
खंडपीठ ने निष्कर्ष दिया कि महागु यादव, बिंदेश्वर दुसाध और अखिलेश सिंह के खिलाफ हत्या तथा गैरकानूनी जमाव से संबंधित आरोप संदेह से परे सिद्ध हुए हैं। तीनों जमानत पर थे। अदालत ने उनके जमानत बांड रद्द करते हुए संबंधित निचली अदालत में आत्मसमर्पण का निर्देश दिया है। आत्मसमर्पण नहीं करने की स्थिति में उनकी हिरासत सुनिश्चित करने का आदेश भी दिया गया है।