धनबाद स्थित आईआईटी-आईएसएम के शोधकर्ताओं ने आरओ से निकलने वाले रिजेक्ट वाटर की बर्बादी कम करने के लिए नई तकनीक विकसित की है। यह व्यवस्था पानी को नाली में बहाने के बजाय इमारत के रूफटॉप टैंक में वापस पहुंचाएगी, जहां से उसका उपयोग पीने के अतिरिक्त अन्य घरेलू कामों में किया जा सकेगा। इस तकनीक को भारतीय पेटेंट भी मिल चुका है।
विकसित प्रणाली का नाम इनबिल्ट रिवर्स ऑस्मोसिस फिल्टर विद कॉन्सन्ट्रेट वाटर मैनेजमेंट सिस्टम है। इसका पेटेंट नंबर 593495 और आवेदन संख्या 202531036943 है। पेटेंट आईआईटी-आईएसएम धनबाद के नाम पर दर्ज है। इसका उद्देश्य आरओ से साफ पानी तैयार करते समय निकलने वाले दूसरे हिस्से को बेकार मानकर छोड़ने के बजाय उपयोगी संसाधन बनाना है।
इस व्यवस्था में आरओ यूनिट को बहुमंजिली इमारत की पहले से मौजूद जलापूर्ति पाइपलाइन से जोड़ा जा सकता है। पंप के जरिये पानी दबाव के साथ यूनिट तक पहुंचेगा। ऊंची इमारतों की पाइपलाइन में उपलब्ध पानी का दबाव भी फिल्ट्रेशन प्रक्रिया में मदद कर सकेगा। आरओ मेम्ब्रेन से एक ओर पीने योग्य साफ पानी मिलेगा, जबकि दूसरी ओर कॉन्सन्ट्रेट या रिजेक्ट वाटर निकलेगा।
सामान्य आरओ व्यवस्था में रिजेक्ट वाटर अक्सर सीधे नाली में चला जाता है। नई प्रणाली में इसे उसी जलापूर्ति नेटवर्क के माध्यम से रूफटॉप टैंक तक पहुंचाने की परिकल्पना की गई है। वहां जमा पानी का इस्तेमाल घर की सफाई, कपड़े धोने और ऐसे दूसरे कार्यों में किया जा सकेगा जिनमें पीने योग्य पानी जरूरी नहीं होता।
यह तकनीक मौजूदा जलापूर्ति ढांचे के बेहतर उपयोग पर भी केंद्रित है। शोधकर्ताओं के अनुसार, खासकर अपार्टमेंट और बहुमंजिली इमारतों में यह व्यवस्था पीने के पानी की शुद्धता बनाए रखते हुए रिजेक्ट वाटर के प्रबंधन में उपयोगी हो सकती है। इससे घरेलू आरओ के संचालन के दौरान पानी की अनावश्यक बर्बादी घटाने का रास्ता खुलता है।
तकनीक विकसित करने वाली टीम में मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर प्रो. विवेक बाजपेयी और डॉ. पवन कुमार सिंह शामिल हैं। उनके साथ शोध के समय पोस्ट-डॉक्टोरल फेलो रहे और वर्तमान में एसआईटी पुणे में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. माधव रतूड़ी तथा रिसर्च स्कॉलर प्रिंस आनंद ने भी काम किया है।