आईआईटी-आईएसएम धनबाद की न्यूरोमॉर्फिक चिप से स्मार्ट ग्लास विकसित करने की तैयारी

मानव मस्तिष्क के न्यूरॉन्स से प्रेरित चिप को दृष्टिबाधित लोगों के स्मार्ट ग्लास, खनिज पहचान प्रणालियों और मेडिकल प्रोसेसिंग में उपयोग करने की संभावनाओं पर काम चल रहा है।

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आईआईटी-आईएसएम धनबाद में विकसित न्यूरोमॉर्फिक चिप की तकनीक पर काम करती शोध टीम

धनबाद स्थित आईआईटी-आईएसएम की एक टीम न्यूरोमॉर्फिक चिप को ऐसी तकनीकी प्रणालियों का हिस्सा बनाने पर काम कर रही है, जिनका उपयोग दृष्टिबाधित लोगों की सहायता से लेकर मेडिकल प्रोसेसिंग तक में किया जा सके। इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. राजीव कुमार रंजन और उनकी टीम ने इस चिप को डिजाइन किया है। इसे सेमीकॉन इंडिया 2026 में भी पहचान मिली थी।

न्यूरोमॉर्फिक तकनीक मानव मस्तिष्क के न्यूरॉन्स की कार्यप्रणाली से प्रेरित है। टीम का लक्ष्य केवल इलेक्ट्रॉनिक सर्किट तैयार करना नहीं, बल्कि कम ऊर्जा में सूचनाओं को संसाधित करने वाली कंप्यूटिंग क्षमता विकसित करना है। आगे चलकर इस क्षमता को वास्तविक जरूरतों के लिए बनाए जाने वाले उपकरणों में शामिल करने की संभावना तलाशी जा रही है।

परियोजना के प्रमुख प्रस्तावित उपयोगों में दृष्टिबाधित लोगों के लिए स्मार्ट ग्लास शामिल है। परिकल्पना के अनुसार, चश्मे में लगे सेंसर आसपास की वस्तुओं और रास्ते की बाधाओं से संबंधित जानकारी जुटा सकेंगे। चिप इस जानकारी के विश्लेषण में सहायता करेगी और प्रणाली आवाज या किसी अन्य संकेत के माध्यम से उपयोगकर्ता को सामने मौजूद अवरोध के बारे में सचेत कर सकेगी।

हालांकि यह स्मार्ट ग्लास अभी तैयार अंतिम उत्पाद नहीं है। पूरी प्रणाली विकसित करने के लिए चिप के साथ सेंसर, सॉफ्टवेयर और अन्य आवश्यक हिस्सों को जोड़ना होगा। संस्थान की टीम चिप को उस व्यापक तकनीकी व्यवस्था के एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में विकसित कर रही है, जिससे उपयोगकर्ता को समय रहते आसपास की स्थिति समझने में मदद मिल सके।

टीम इस तकनीक को स्मार्ट ग्लास तक सीमित नहीं मान रही है। क्रिटिकल मिनरल और रेयर अर्थ एलिमेंट की पहचान करने वाली प्रणालियों में भी इसके उपयुक्त हिस्से को जोड़ने की संभावनाओं पर प्रयोग हो रहे हैं। चिप स्वयं खनिज खोजने वाली मशीन नहीं होगी, बल्कि जरूरत के अनुसार किसी डिटेक्शन सिस्टम में इसका एकीकरण किया जा सकेगा।

मेडिकल क्षेत्र में सिग्नल और डेटा प्रोसेसिंग से जुड़े कार्यों के लिए भी इसकी क्षमता पर विचार किया जा रहा है। अलग-अलग उपयोगों के लिए अभी विकास और परीक्षण की प्रक्रिया जरूरी है। इस पहल का केंद्र ऐसी ऊर्जा-कुशल प्रोसेसिंग तकनीक तैयार करना है, जिसे भविष्य में विभिन्न सहायक, वैज्ञानिक और चिकित्सा उपकरणों के अनुरूप ढाला जा सके।