झारखंड हाईकोर्ट ने आईआईटी-आईएसएम धनबाद के कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति व्यवस्था से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने संबंधित कर्मचारियों को जीपीएफ-कम-पेंशन योजना के दायरे में मानने का निर्देश दिया। अदालत ने यह फैसला 29 सितंबर 2026 को सुनाया।
विवाद तत्कालीन भारतीय स्कूल ऑफ माइंस के उन कर्मचारियों से जुड़ा है, जिन्हें संस्थान ने 1987 में सीपीएफ या जीपीएफ-कम-पेंशन योजना में से एक विकल्प चुनने का अवसर दिया था। बाद में 2017 में कुछ कर्मचारियों को जीपीएफ-कम-पेंशन व्यवस्था में शामिल किया गया, लेकिन केंद्रीय मंत्रालयों की आपत्तियों के बाद संस्थान के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स ने 4 सितंबर 2019 को उन्हें फिर सीपीएफ योजना में भेजने का निर्णय लिया था।
इस फैसले को कर्मचारियों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। उनकी ओर से कहा गया कि 1 जनवरी 1986 के बाद नियुक्त कर्मचारियों को जीपीएफ व्यवस्था में रखा जाना था और उनसे सीपीएफ चुनने का विकल्प लेना नियमों के अनुरूप नहीं था। कर्मचारियों ने 3 जनवरी 1994 के नोटिस और 2017 की समिति के निष्कर्षों का भी आधार लिया।
केंद्र सरकार ने अपील में तर्क दिया था कि कर्मचारियों ने स्वयं सीपीएफ योजना चुनी थी और लंबे समय तक उसी व्यवस्था में बने रहे। सरकार का यह भी कहना था कि संस्थान स्वायत्त निकाय था तथा पेंशन व्यवस्था में बदलाव के लिए केंद्र की अनुमति आवश्यक थी।
खंडपीठ ने माना कि 1 जनवरी 1986 के बाद नियुक्त कर्मचारियों से सीपीएफ का विकल्प लेना संस्थान की गलती थी। अदालत ने कहा कि इस प्रक्रिया के आधार पर कर्मचारियों को पेंशन योजना से वंचित नहीं किया जा सकता। निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लेख करते हुए जीपीएफ को सामान्य व्यवस्था और सीपीएफ को अपवाद बताया गया।
हाईकोर्ट के निर्देश के अनुसार, सेवानिवृत्त हो चुके जिन कर्मचारियों को सीपीएफ लाभ नहीं मिला है, उन्हें जीपीएफ-कम-पेंशन योजना के तहत पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभ दिए जाएंगे। जिन सेवानिवृत्त कर्मचारियों को सीपीएफ का लाभ मिल चुका है, उन्हें जीपीएफ पेंशन लेने के लिए सीपीएफ खाते में संस्थान की ओर से जमा सरकारी अंशदान वापस करना होगा।