झारखंड हाईकोर्ट ने आपसी सहमति के आधार पर दिए गए तलाक के एक आदेश को रद्द करते हुए मामले की दोबारा सुनवाई का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति संजय प्रसाद की खंडपीठ ने कहा कि विवाह की वास्तविक तारीख, पत्नी की सहमति और आर्थिक समझौते जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं की समुचित जांच जरूरी है। मामला अब नए सिरे से विचार के लिए रांची फैमिली कोर्ट भेजा गया है।
यह वैवाहिक विवाद चतरा की चंपा कुमारी और रांची के विशांत सागर से संबंधित है। रांची फैमिली कोर्ट ने 17 अगस्त 2024 को दोनों पक्षों की आपसी सहमति के आधार पर विवाह विच्छेद का आदेश दिया था। पत्नी ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। मामले की सुनवाई एफए संख्या 121/2025 के तहत हुई।
अपील में विवाह की तारीख को लेकर अंतर सामने आया। पत्नी की ओर से कहा गया कि विवाह 21 अप्रैल 2024 को चतरा जिले के सिमरिया में हुआ था, जबकि फैमिली कोर्ट के आदेश में तारीख 21 अप्रैल 2023 दर्ज की गई। तलाक की संयुक्त याचिका 12 जून 2024 को दाखिल हुई थी। हाईकोर्ट ने वास्तविक विवाह तिथि निर्धारित करना आवश्यक माना।
खंडपीठ ने कहा कि यदि विवाह 21 अप्रैल 2024 को ही हुआ था, तो संयुक्त याचिका दाखिल होने के समय हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13बी के तहत एक वर्ष अलग रहने की शर्त पर विचार जरूरी होगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि मध्यस्थता में समझौता हो जाने भर से फैमिली कोर्ट की वैधानिक जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती। उसे यह सुनिश्चित करना होता है कि सहमति स्वैच्छिक है और सभी कानूनी शर्तें पूरी हुई हैं।
पत्नी ने दहेज प्रताड़ना, दबाव में हस्ताक्षर कराने और गर्भावस्था समाप्त होने से जुड़े आरोप भी लगाए हैं। हाईकोर्ट के आदेश में इन आरोपों को साबित तथ्य नहीं माना गया है। पति की ओर से तलाक के आदेश का समर्थन करते हुए कहा गया कि अलग होने का फैसला सहमति से हुआ था और पत्नी को चार लाख रुपये तथा स्त्रीधन देने की बात रखी गई थी।
अब फैमिली कोर्ट विवाह की सही तारीख, आर्थिक समझौते, पत्नी की सहमति की स्वैच्छिकता और संबंधित तथ्यों की फिर से पड़ताल करेगा। हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों को आदेश की तारीख से छह सप्ताह के भीतर फैमिली कोर्ट में उपस्थित होकर अपना पक्ष और साक्ष्य प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। तलाक आदेश रद्द होने का अर्थ पत्नी की ओर से लगाए गए आरोपों की न्यायिक पुष्टि नहीं है।