कुंदा में पुल और पक्के रास्ते का अभाव, बारिश में नदी पार कर स्कूल पहुंचते हैं 629 बच्चे

चतरा के कुंदा प्रखंड में 13 विद्यालयों के करीब 629 बच्चे बरसात के दौरान नदी-नाले पार कर स्कूल पहुंचते हैं। जलस्तर बढ़ने पर उनकी पढ़ाई और ग्रामीणों की आवाजाही प्रभावित होती है।

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चतरा के कुंदा प्रखंड में बारिश के दौरान नदी पार कर स्कूल जाते बच्चे

चतरा जिले के कुंदा प्रखंड में पुल-पुलिया और पक्के संपर्क मार्ग नहीं होने से बरसात के दौरान बच्चों का स्कूल पहुंचना जोखिम भरा हो गया है। प्रखंड के 13 विद्यालयों में पढ़ने वाले करीब 629 बच्चे इस समस्या से प्रभावित बताए गए हैं। लगातार बारिश के बाद नदियों और छोटे नालों का जलस्तर बढ़ने पर गांवों को स्कूलों से जोड़ने वाले रास्तों पर आवागमन कठिन हो जाता है।

उल्लवार, ककनातू, टटेज और रेंगनियातरी सहित कई गांवों के विद्यार्थियों को स्कूल जाने के लिए नदी पार करनी पड़ती है। पानी बढ़ने पर कई बच्चे विद्यालय नहीं पहुंच पाते। कुछ बच्चे तेज बहाव के बीच एक-दूसरे का हाथ पकड़कर आगे बढ़ते हैं। वे जूते हाथ में और बस्ता पीठ पर रखकर पानी से गुजरते हैं।

बच्चों के साथ उनके अभिभावकों की चिंता भी बढ़ी हुई है। छोटे बच्चों को सुरक्षित पार कराने के लिए कई बार परिजन उन्हें गोद या कंधे पर बैठाकर नदी के दूसरी ओर ले जाते हैं। विद्यार्थियों के अनुसार, नदी का पानी बढ़ने पर उन्हें डर लगता है। ऐसी स्थिति में नियमित उपस्थिति बनाए रखना भी मुश्किल हो जाता है।

ग्रामीणों का कहना है कि सिंदरी, द्वारपार, हथवार और कुंदा नदियों पर पुल नहीं होने के कारण हर बरसात में परेशानी गंभीर हो जाती है। इसका असर केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं है। मरीजों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों को भी आने-जाने में कठिनाई होती है। ग्रामीणों के मुताबिक, हाल में एक प्रसूता समय पर अस्पताल नहीं पहुंच सकी थी।

बारिश के दिनों में विद्यालयों तक मध्याह्न भोजन का राशन और अन्य जरूरी सामान पहुंचाने में भी बाधा आती है। जलस्तर अधिक होने पर संपर्क टूटने जैसी स्थिति बन जाती है, जिससे बच्चों की कक्षाएं प्रभावित होने के साथ स्कूल की नियमित व्यवस्थाओं को संचालित करना कठिन हो जाता है।

स्थानीय लोग लंबे समय से सुरक्षित आवागमन के लिए पुल-पुलिया और पक्के संपर्क मार्ग की मांग कर रहे हैं। जिला शिक्षा अधीक्षक ने समस्या के समाधान की दिशा में पहल करने का भरोसा दिया है। ग्रामीणों को अब ऐसी स्थायी व्यवस्था की प्रतीक्षा है, जिससे बरसात में भी बच्चे बिना जोखिम के विद्यालय पहुंच सकें और आवश्यक सेवाओं तक गांवों की पहुंच बनी रहे।