रांची में झारखंड हाई कोर्ट ने एक आपराधिक मामले की सुनवाई करते हुए कहा है कि किसी व्यक्ति के विरुद्ध केवल उसके पदनाम के आधार पर कार्रवाई नहीं चलाई जा सकती। जस्टिस एके चौधरी की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि समन जारी करते समय संबंधित व्यक्ति का नाम दर्ज होना आवश्यक है। इसी आधार पर अदालत ने दो आरोपितों के खिलाफ जारी कार्रवाई निरस्त कर दी।
यह मामला सितंबर 2013 की एक कथित घटना से संबंधित है। याचिका में दिए गए विवरण के मुताबिक, हिंदुजा लेलैंड फाइनेंस लिमिटेड से वित्तपोषित 12 पहिया वाहन को दो मार्च 2015 को कोयला ले जाते समय रोका गया था। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि कंपनी के कर्मचारियों ने चालक से 50 हजार रुपये छीन लिए और वाहन अपने कब्जे में ले लिया।
शिकायत तथा गवाहों से जुड़े दस्तावेजों के आधार पर न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत ने मामले में प्रथम दृष्टया संज्ञान लिया था। इसके बाद पांच अगस्त 2023 को आरोपितों के खिलाफ समन जारी किया गया। निचली अदालत की इस कार्यवाही को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ताओं ने झारखंड हाई कोर्ट का रुख किया था।
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने पाया कि संबंधित व्यक्तियों की पहचान उनके नाम के बजाय पद के आधार पर की गई थी। अदालत के अनुसार, किसी पद को धारण करने वाला पदनाम स्वयं कोई कानूनी व्यक्ति नहीं होता। इसलिए आपराधिक मामले में केवल पदनाम लिखकर किसी व्यक्ति को समन भेजना विधिसम्मत प्रक्रिया नहीं माना जा सकता।
एकल पीठ ने इसे गंभीर कानूनी त्रुटि मानते हुए कहा कि ऐसी कार्यवाही जारी रहने से कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग की आशंका है। अदालत ने रांची के न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी द्वारा लिया गया संज्ञान और पांच अगस्त 2023 का समन आदेश रद्द कर दिया। इसके साथ ही दोनों आरोपितों के विरुद्ध चल रही पूरी आपराधिक कार्रवाई भी निरस्त कर दी गई।
फैसले का मुख्य आधार समन में आरोपी की स्पष्ट पहचान का अभाव रहा। हाई कोर्ट की टिप्पणी के अनुसार, आपराधिक दायित्व तय करने की प्रक्रिया किसी सामान्य पद या पदनाम पर नहीं, बल्कि नाम से पहचाने गए संबंधित व्यक्ति के विरुद्ध ही आगे बढ़ाई जानी चाहिए।