खूंटी के जरियागढ़ में करीब 300 वर्षों से कायम है दुर्गापूजा की परंपरा

कर्रा प्रखंड के जरियागढ़ में राजपरिवार और ग्रामीणों के सहयोग से दुर्गापूजा की पुरानी परंपरा आज भी जारी है। कभी यहां के दशहरा मेले में दूर-दराज से लोग और व्यापारी पहुंचते थे।

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खूंटी के जरियागढ़ में आयोजित पारंपरिक दुर्गापूजा का दृश्य

खूंटी जिले के कर्रा प्रखंड स्थित जरियागढ़ में दुर्गापूजा की करीब 300 वर्ष पुरानी परंपरा आज भी कायम है। समय के साथ दशहरा मेले का स्वरूप और आयोजन की व्यवस्थाएं बदली हैं, लेकिन राजपरिवार तथा ग्रामीणों की भागीदारी से पूजा का सिलसिला लगातार आगे बढ़ रहा है। यह आयोजन क्षेत्र की धार्मिक आस्था के साथ उसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ा है।

स्थानीय परंपरागत विवरणों के मुताबिक, जरियागढ़ में दुर्गापूजा की शुरुआत ठाकुर नरेंद्र नाथ शाहदेव ने की थी। वह छोटानागपुर के महाराजा के भाई कुंवर हरिनाथ शाहदेव के वंशज बताए जाते हैं। उनका विवाह पश्चिम बंगाल के पंचकोट-काशीपुर राजपरिवार में हुआ था। माना जाता है कि इसी सांस्कृतिक संपर्क से प्रेरित होकर यहां देवी की आराधना आरंभ हुई।

उस दौर में जरियागढ़ स्टेट को सोनपुर परगना के नाम से जाना जाता था। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, दशहरा के अवसर पर परगना के करीब 800 गांवों के लोग यहां जुटते थे। ओडिशा, पश्चिम बंगाल और छोटानागपुर के दूरस्थ क्षेत्रों से श्रद्धालुओं तथा व्यापारियों के आने के कारण यह मेला पूजा के साथ सामाजिक मेल-मिलाप और व्यापारिक गतिविधियों का भी प्रमुख केंद्र बन गया था।

बदलते समय के साथ मेले की पुरानी भव्यता और व्यवस्थाओं में परिवर्तन आया है। पहले पूजा के दौरान भैंस और बकरे की बलि की प्रथा थी। अब भैंस की बलि बंद हो चुकी है, जबकि बकरे की बलि की परंपरा जारी बताई गई है। आयोजन की तैयारियां हर वर्ष राजपरिवार और स्थानीय ग्रामीण मिलकर करते हैं।

पूजा से जुड़े धार्मिक दायित्व भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित हुए हैं। पहले प्रतिमा की पूजा कराने के लिए पश्चिम बंगाल से पुजारी बुलाए जाते थे। योगेश्वर दास से शुरू हुई यह जिम्मेदारी अब उनके पौत्र मुरली दास निभा रहे हैं। दस भुजी देवी मंडप में राजपुरोहित की परंपरा गोपाल नाथ शर्मा के परिवार में आगे बढ़ी और वर्तमान में अशोक कुमार शर्मा इसका निर्वहन कर रहे हैं। मां चिंतामणि की पूजा मसमानो गांव के साउंगी परिवार के बसंत साडंगी कराते हैं।

ठाकुर नरेंद्र नाथ शाहदेव के बाद राजपरिवार की कई पीढ़ियों ने इस आयोजन को आगे बढ़ाया। वर्तमान में ठाकुर जयेंद्र नाथ शाहदेव के नेतृत्व में परिवार के सदस्य पूजा की तैयारियों में शामिल होते हैं। स्थानीय समुदाय की सहभागिता और पीढ़ियों से चली आ रही जिम्मेदारियां जरियागढ़ की दुर्गापूजा को केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि क्षेत्र की साझा सांस्कृतिक विरासत बनाती हैं।