सरायकेला में पितृ विसर्जन के बाद महालया से शुरू हुई शक्ति उपासना

सरायकेला में सर्वपितृ अमावस्या पर नदी घाटों में तर्पण और जलांजलि के बाद महालया के साथ दुर्गा पूजा की गतिविधियां शुरू हो गईं। मंदिरों और पूजा पंडालों में चंडी पाठ गूंजा।

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सरायकेला में सर्वपितृ अमावस्या पर पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और महालया पर शक्ति उपासना की परंपराएं एक साथ दिखाई दीं। खरकई और संजय नदी के विभिन्न घाटों पर पितृ विसर्जन के अनुष्ठान पूरे होने के बाद क्षेत्र में दुर्गा पूजा की गतिविधियां तेज हो गईं।

सुबह से ही श्रद्धालु दोनों नदियों के घाटों पर पहुंचने लगे थे। वहां वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पूर्वजों की स्मृति में जलांजलि और तर्पण किया गया। अनुष्ठान में कुश, जौ, तिल और जल का प्रयोग करते हुए लोगों ने पितरों को याद किया और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की।

घाटों पर धूप-दीप और पिंडदान की परंपरा भी निभाई गई। इसके साथ पितृपक्ष का समापन हुआ। एक ओर लोगों ने अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता प्रकट की, वहीं दूसरी ओर महालया के आगमन के साथ देवी दुर्गा की आराधना का क्रम प्रारंभ हो गया।

सरायकेला के देवी मंदिरों और दुर्गा पूजा पंडालों में चंडी पाठ तथा मां दुर्गा के आह्वान से जुड़े गीत सुनाई देने लगे। शंखध्वनि और देवी मंत्रों के बीच श्रद्धालुओं ने पूजा-अर्चना की। महालया से जुड़ी धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी अवसर पर मां दुर्गा का पृथ्वी लोक के लिए प्रस्थान माना जाता है।

महालया शुरू होने के साथ पूजा समितियों ने पंडालों को अंतिम रूप देने का काम तेज कर दिया है। स्थानीय मूर्तिकार भी दुर्गा प्रतिमाओं के चक्षु दान की तैयारी में जुटे हैं। क्षेत्र में पारंपरिक स्वरूप के साथ आधुनिक विषयों पर आधारित पूजा पंडाल भी तैयार किए जा रहे हैं।

पितृपक्ष की विदाई और शक्ति आराधना की शुरुआत ने सरायकेला में धार्मिक गतिविधियों का स्वरूप बदल दिया है। नदी घाटों पर संपन्न हुए स्मरण और तर्पण के अनुष्ठानों के बाद अब मंदिरों तथा पंडालों में दुर्गा पूजा की तैयारियां प्रमुखता से दिखाई दे रही हैं।