गढ़वा जिले के मरहटिया क्षेत्र में नवरात्र के दौरान निभाई जाने वाली फूल-लोढ़ी परंपरा लोक आस्था, पारिवारिक संबंधों और सामूहिक भागीदारी का विशिष्ट रूप है। इसमें गांव की महिलाएं और बच्चियां सात दिनों तक शिव-पार्वती की आराधना करती हैं। फूलों से सजी डलिया, पारंपरिक गीत और झूमर इस आयोजन के प्रमुख हिस्से हैं।
श्री सर्वेश्वरी समूह की मरहटिया शाखा के उपाध्यक्ष रबीन्द्रनाथ द्विवेदी के अनुसार, उन्होंने वर्ष 1982 से आश्विन नवरात्र के समय इस परंपरा को करीब से देखा है। नवरात्र के चौथे या पांचवें दिन महिलाओं और बच्चियों के समूह फूलों की डलिया लेकर आश्रम पहुंचते हैं। मंदिर में प्रणाम करने के बाद वे शिव-पार्वती से जुड़े लोकगीत गाती और झूमर प्रस्तुत करती हैं।
परंपरा के तहत गांव में जन्मी विवाहित महिलाएं नवरात्र में अपने नैहर लौटती हैं। आश्विन अमावस्या को देवी-देवताओं के आह्वान के बाद प्रतिपदा के दिन शिव, गौरी और गणेश की मिट्टी की प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। इसके बाद महिलाएं प्रतिदिन स्नान और पूजा करके समूह में गांव तथा आसपास के प्रमुख मंदिरों तक जाती हैं।
पूजा में उपयोग के लिए महिलाएं डलिया में जंगली फूल एकत्र करती हैं। वे दिनभर उपवास रखती हैं और शाम को जुटाए गए फूल मिट्टी की प्रतिमाओं पर अर्पित करने के बाद भोजन करती हैं। इस क्रम में धार्मिक अनुष्ठान के साथ स्थानीय प्रकृति और ग्रामीण जीवन का जुड़ाव भी दिखाई देता है।
फूल-लोढ़ी के पांचवें दिन आद्रा नदी के किनारे अलग-अलग गांवों की महिलाओं का सामूहिक मिलन होता है। वहां पूजा के साथ पारंपरिक गीत और झूमर आयोजित किए जाते हैं। सप्तमी को सात दिनों के दौरान जुटाए गए फूलों और मिट्टी की प्रतिमाओं का नदी में विसर्जन किया जाता है। इस अवसर पर महिलाओं के भाई भी सहयोग के लिए नदी तक पहुंचते हैं।
संकल्प लेकर फूल-लोढ़ी शुरू करने वाली महिलाएं इसे निभाने के लिए प्रत्येक वर्ष नैहर लौटती हैं। उम्र या स्वास्थ्य के कारण आगे पूजा कर पाना संभव नहीं होने पर उत्सवपूर्वक इस साधना को विराम दिया जाता है। बुजुर्ग महिलाओं से लेकर छोटी बच्चियों की भागीदारी मरहटिया में पीढ़ियों से चली आ रही इस सांस्कृतिक परंपरा को आगे बढ़ाती है।