धनबाद की दुर्गापूजा में गूंज रही ढाक की थाप, विरासत बचाने के साथ आजीविका की चुनौती

मुर्शिदाबाद से धनबाद पहुंचे ढाक कलाकार दुर्गापूजा में पारंपरिक धुनों से भक्ति का रंग भर रहे हैं। पीढ़ियों पुरानी इस कला के साथ उनके सामने सालभर की आजीविका और नई पीढ़ी को जोड़ने की चुनौती भी है।

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धनबाद में दुर्गापूजा के दौरान पारंपरिक ढाक बजाते कलाकार

धनबाद में दुर्गापूजा के दौरान ढाक की पारंपरिक थाप श्रद्धा और उत्सव के माहौल का अहम हिस्सा बनी हुई है। पूजा पंडालों में यह कला प्रस्तुत करने के लिए पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद से आए कलाकार रवि दास और मेघनाथ दास भी शहर पहुंचे हैं। उनके गांव के कई अन्य कलाकार भी हर साल इस अवसर पर धनबाद आते हैं।

इन कलाकारों के लिए ढाक बजाना केवल मौसमी काम नहीं, बल्कि परिवार से मिली सांस्कृतिक विरासत है। मेघनाथ दास ने करीब दस वर्ष की उम्र में यह कला सीखनी शुरू की थी। उनके दादा और पिता भी ढाक बजाते थे। परिवार के बड़ों को देखकर सीखी गई वही कला अब उनकी आजीविका और धार्मिक आयोजनों से जुड़ाव का माध्यम है।

दुर्गापूजा के दिनों में ढाक कलाकारों की मांग रहती है, लेकिन उत्सव समाप्त होने के बाद उनके सामने नियमित आय का प्रश्न फिर खड़ा हो जाता है। मेघनाथ दास ढाक बजाने के अतिरिक्त खेती-बाड़ी भी करते हैं, ताकि पूरे वर्ष परिवार का खर्च चलाया जा सके। इस स्थिति में परंपरा को जारी रखने और रोजमर्रा की आर्थिक जिम्मेदारियां निभाने की चुनौती साथ-साथ बनी रहती है।

मेघनाथ की इच्छा है कि उनके बच्चे भी ढाक बजाना सीखें और परिवार की कला को आगे बढ़ाएं। इसके साथ वह बच्चों के लिए रोजगार के दूसरे अवसरों की आवश्यकता को भी समझते हैं। कलाकारों का यह अनुभव बताता है कि विरासत का हस्तांतरण केवल प्रशिक्षण से नहीं, बल्कि टिकाऊ आजीविका की संभावनाओं से भी जुड़ा है।

हीरापुर हरिमंदिर में पूजा देखने आने वाली अधिवक्ता मिट्ठू रानी के अनुसार, ढाक की ध्वनि उन्हें अलग आध्यात्मिक अनुभूति कराती है। मंदिर के पुजारी और पूजा समिति के संयुक्त सचिव अशोक चटर्जी भी पारंपरिक पूजा में ढाक को विशेष महत्व देते हैं। उनके मुताबिक इसकी गूंज मां दुर्गा की आराधना का अभिन्न अंग मानी जाती है।

मुर्शिदाबाद से धनबाद तक पहुंची ढाक की यह परंपरा पूजा की भक्ति, कलाकारों के कौशल और उनकी आजीविका—तीनों को जोड़ती है। कलाकार चाहते हैं कि नई पीढ़ी इस विरासत से जुड़ी रहे, लेकिन इसके लिए पारंपरिक कला के साथ बेहतर अवसरों की जरूरत भी सामने आती है। दुर्गापूजा में सुनाई देने वाली हर थाप के पीछे वर्षों का अभ्यास और कई पीढ़ियों की साधना जुड़ी है।