गढ़वा में रोग निगरानी और रियल टाइम डेटा प्रविष्टि मजबूत करने पर एनसीडीसी टीम का जोर

एनसीडीसी की राज्य स्तरीय टीम ने गढ़वा की स्वास्थ्य सेवाओं के मूल्यांकन के बाद निगरानी, रियल टाइम रिपोर्टिंग, जीवनरक्षक दवाओं के बफर स्टॉक और विभागीय समन्वय में सुधार की जरूरत बताई।

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गढ़वा की स्वास्थ्य व्यवस्था के मूल्यांकन पर जानकारी देते अधिकारी और चिकित्सक

गढ़वा जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था के दो दिवसीय मूल्यांकन में रोग निगरानी और रियल टाइम डेटा प्रविष्टि से जुड़ी कमियां सामने आई हैं। नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल की स्टेट पब्लिक हेल्थ ऑब्जर्वेशन टीम ने जिले में सर्विलांस का स्तर 75 प्रतिशत पाया। टीम के अनुसार राष्ट्रीय स्तर पर यह आंकड़ा 80 प्रतिशत है, इसलिए स्थानीय निगरानी व्यवस्था को और मजबूत करने की आवश्यकता है।

मूल्यांकन के दौरान टीम ने सदर अस्पताल गढ़वा, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र भंडरिया और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र चिनियां का निरीक्षण किया। इन संस्थानों में स्वास्थ्य सेवाओं के साथ वन हेल्थ कार्यक्रम के क्रियान्वयन की स्थिति देखी गई। इसके बाद सिविल सर्जन कार्यालय के सभागार में आयोजित पत्रकार वार्ता में मूल्यांकन के प्रमुख निष्कर्ष साझा किए गए।

टीम ने बीमारी के संभावित प्रकोप की शुरुआती स्तर पर पहचान के लिए एकीकृत स्वास्थ्य सूचना मंच पर समय से डेटा दर्ज करने को जरूरी बताया। रिपोर्टिंग इकाइयों को लक्षण आधारित, अनुमानित और प्रयोगशाला आधारित रिपोर्ट नियमित रूप से जमा करने का निर्देश दिया गया है। मूल्यांकन में माना गया कि डेटा प्रविष्टि की सुस्ती बीमारी की पहचान और त्वरित कार्रवाई को प्रभावित कर सकती है।

प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र स्तर तक एंटी स्नेक वेनम की उपलब्धता को टीम ने सकारात्मक पहल माना। हालांकि, एंटी स्नेक वेनम और एंटी रेबीज वैक्सीन जैसी जीवनरक्षक दवाओं की लगातार उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए बफर स्टॉक मजबूत करने की जरूरत बताई गई। इसके लिए आपूर्ति शृंखला और भंडारण व्यवस्था को बेहतर बनाने पर जोर दिया गया है।

वन हेल्थ कार्यक्रम के तहत शिक्षा, महिला एवं बाल विकास, पशुपालन और खाद्य सुरक्षा विभागों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता भी रेखांकित की गई। चिकित्सा पदाधिकारियों, लैब तकनीशियनों, सहिया और एएनएम को रोगाणुरोधी प्रतिरोध, बहु-क्षेत्रीय समन्वय तथा जलवायु जनित बीमारियों से निपटने का प्रशिक्षण देने की बात कही गई है।

आपात स्थितियों की तैयारी के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में नियमित अग्नि सुरक्षा मॉक ड्रिल कराने और अस्पतालों में आपदा प्रतिक्रिया व्यवस्था विकसित करने का निर्देश दिया गया। उप मंडलीय अस्पतालों में ग्रीन एंड क्लाइमेट रेजिलिएंट टूल लागू करने की तैयारी भी है, ताकि जलवायु आधारित आपदाओं के दौरान स्वास्थ्य सेवाओं को निर्बाध रखा जा सके।