जितिया पर्व 2 अक्टूबर 2026 को नहाय-खाय के साथ आरंभ होगा। अगले दिन 3 अक्टूबर को व्रती निर्जला व्रत रखेंगी और 4 अक्टूबर को पारण किया जाएगा। झारखंड के कई परिवारों में इस पर्व के दौरान चिल्हो-सियारो के लिए भोजन का एक हिस्सा अलग निकालने और उनकी प्रतीकात्मक पूजा करने की परंपरा निभाई जाती है।
रांची और आसपास के क्षेत्रों में पूजा सामग्री के रूप में चावल, फल, मिठाई, पेड़ा, पान-सुपारी और सिंदूर का उपयोग किया जाता है। कुछ परिवार चिल्हो-सियारो की प्रतीकात्मक आकृति बनाकर पूजा करते हैं। कहीं ओठगन के भोजन में से हिस्सा रखा जाता है तो कहीं ठेकुआ, खस्ता या दही अर्पित किया जाता है।
यह परंपरा जितिया से जुड़ी उस लोककथा पर आधारित मानी जाती है जिसमें चिल्हो यानी चील और सियारो यानी सियारिन ने जीवित्पुत्रिका व्रत रखने का संकल्प लिया था। इसी कथा के कारण अनेक स्थानों पर उनके नाम से भोजन निकालने की प्रथा चली आ रही है। हालांकि पूरे झारखंड में इसके लिए कोई एक निश्चित पकवान या समान विधि प्रचलित नहीं है।
कुछ स्थानीय परंपराओं में पारण के समय भी पहले चिल्हो-सियारो को भोजन देने की मान्यता है। कहीं भीगे हुए उड़द और चावल के दाने अर्पित किए जाते हैं। कुछ क्षेत्रों में पारण के लिए कढ़ी-चावल, फुलवरा, पकौड़ी और चने की सब्जी जैसे व्यंजन भी तैयार किए जाते हैं।
जितिया के लोकगीतों में मड़ुआ की रोटी, नेनुआ और दूसरे स्थानीय खाद्य पदार्थों का उल्लेख मिलता है। ये गीत पर्व के धार्मिक पक्ष के साथ पारंपरिक खान-पान और क्षेत्रीय रीति-रिवाजों की झलक भी देते हैं। परिवार, गांव और इलाके के अनुसार सामग्री तथा पूजा की प्रक्रिया में अंतर हो सकता है।
बिहार के भोजपुर, मगध और मिथिलांचल में भी चिल्हो-सियारो के लिए भोजन रखने की परंपरा मिलती है, लेकिन वहां प्रचलित पकवानों और समय में भिन्नता है। कहीं ठेकुआ, खस्ता और दही-चूड़ा रखा जाता है तो मिथिलांचल में मड़ुआ की रोटी और नोनी साग का चलन बताया गया है। इस क्षेत्रीय विविधता के कारण जितिया की परंपरा को किसी एक भोजन या नियम तक सीमित नहीं माना जाता।