झारखंड के 3,500 से अधिक सरकारी भवनों पर लगे सौर संयंत्र, डिजिटल निगरानी की तैयारी

राज्य में करीब 82 मेगावाट क्षमता के रूफटॉप सौर संयंत्र और 617 से अधिक मिनी ग्रिड की निगरानी के लिए आईओटी आधारित व्यवस्था तैयार करने की योजना है।

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झारखंड में सरकारी भवन की छत पर लगा रूफटॉप सौर ऊर्जा संयंत्र

रांची में झारखंड रिन्यूएबल एनर्जी डेवलपमेंट एजेंसी राज्य की सौर ऊर्जा परियोजनाओं की डिजिटल निगरानी की तैयारी कर रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, झारखंड के 3,500 से अधिक सरकारी भवनों की छतों पर लगाए गए सौर ऊर्जा संयंत्रों की कुल क्षमता करीब 82 मेगावाट है। प्रस्तावित व्यवस्था से इनके उत्पादन, प्रदर्शन और तकनीकी स्थिति की जानकारी एक ही डिजिटल प्रणाली में जुटाई जा सकेगी।

सरकारी भवनों के अलावा दुर्गम ग्रामीण इलाकों में 617 से अधिक सौर मिनी ग्रिड लगाए गए हैं। इनकी कुल क्षमता लगभग 10.60 मेगावाट बताई गई है। एजेंसी का दावा है कि इन मिनी ग्रिड के माध्यम से 30 हजार से अधिक घरों तक बिजली पहुंची है। नई निगरानी प्रणाली के दायरे में इन ग्रामीण परियोजनाओं को भी शामिल करने की तैयारी है।

इस काम के लिए एक एजेंसी चुनी जाएगी, जो इंटरनेट ऑफ थिंग्स यानी आईओटी पर आधारित प्रणाली विकसित करेगी। इसके जरिये प्रत्येक संयंत्र की मौजूदा स्थिति, बिजली उत्पादन और प्रदर्शन दर्ज किया जाएगा। तकनीकी खराबी या निर्धारित क्षमता की तुलना में कम उत्पादन की पहचान भी डिजिटल तरीके से करने का लक्ष्य रखा गया है।

चयनित एजेंसी को प्रणाली की डिजाइनिंग, विकास, क्रियान्वयन, होस्टिंग और संचालन की जिम्मेदारी दी जाएगी। इसके साथ परिसंपत्ति और भंडार प्रबंधन की ऑनलाइन व्यवस्था तथा सूचना प्रौद्योगिकी आधारित प्रदर्शन निगरानी और मूल्यांकन ढांचा भी बनाया जाएगा। इससे अलग-अलग स्थानों पर लगे उपकरणों और उनके रखरखाव का रिकॉर्ड एक मंच पर उपलब्ध हो सकेगा।

राज्यभर की इन परियोजनाओं के लिए तीन वर्ष का व्यापक वार्षिक रखरखाव अनुबंध करने की भी योजना है। इसका उद्देश्य संयंत्रों की नियमित देखरेख सुनिश्चित करना और खराबी सामने आने पर समाधान की प्रक्रिया तेज करना है। डिजिटल रिकॉर्ड से यह जानने में मदद मिलने की उम्मीद है कि कौन-सा संयंत्र तय क्षमता के अनुरूप काम कर रहा है और कहां सुधार की आवश्यकता है।

एजेंसी के अनुसार, सरकारी भवनों पर लगे रूफटॉप सौर संयंत्रों से बिजली खर्च में सालाना करीब 66 से 70 करोड़ रुपये की बचत होने का दावा है। प्रस्तावित डिजिटल ढांचा लागू होने के बाद इस बड़े सौर नेटवर्क के उत्पादन और रखरखाव का व्यवस्थित आकलन संभव हो सकेगा। योजना का जोर नए संयंत्र लगाने के साथ पहले से मौजूद परियोजनाओं के प्रदर्शन पर लगातार नजर रखने पर भी है।