रांची में झारखंड हाईकोर्ट ने झारखंड आर्म्ड पुलिस (JAP) में वर्ष 2016 में नियुक्त चतुर्थवर्गीय कर्मचारियों के पक्ष में अहम आदेश दिया है। अदालत ने राज्य सरकार को बर्खास्तगी से पुनर्बहाली तक की अवधि का पूरा बकाया वेतन और उससे जुड़े परिणामी सेवा लाभ देने का निर्देश दिया। आदेश का अनुपालन आठ सप्ताह के भीतर करना होगा।
यह विवाद JAP में चतुर्थवर्गीय पदों की वर्ष 2016 की भर्ती से जुड़ा है। चयन प्रक्रिया के बाद अभ्यर्थियों को नियुक्ति मिली थी। बाद में भर्ती में कथित अनियमितताओं से संबंधित शिकायतें सामने आने पर राज्य सरकार ने तीन सदस्यीय जांच समिति बनाई। समिति की रिपोर्ट के आधार पर पूरी चयन प्रक्रिया रद्द कर दी गई और नियुक्त कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त कर दी गईं।
सरकार के निर्णय को प्रभावित कर्मचारियों ने हाईकोर्ट में रिट याचिकाओं के माध्यम से चुनौती दी थी। सुनवाई के बाद अदालत ने नियुक्तियां रद्द करने वाला आदेश निरस्त कर दिया और याचिकाकर्ताओं को परिणामी सेवा लाभों का अधिकारी माना। इसके बाद राज्य सरकार ने कर्मचारियों को दोबारा सेवा में बहाल कर दिया था।
बहाली के बावजूद सेवा से बाहर रहने की अवधि के वेतन पर विवाद बना रहा। राज्य सरकार ने अलग आदेश जारी कर कहा कि उस दौरान कर्मचारियों ने काम नहीं किया, इसलिए “नो वर्क, नो पे” के सिद्धांत के आधार पर वेतन नहीं दिया जाएगा। इसके खिलाफ दिकेश कुमार और अन्य कर्मचारियों ने अधिवक्ता चंचल जैन के माध्यम से फिर हाईकोर्ट का रुख किया।
याचिकाकर्ताओं का पक्ष था कि वे अपनी इच्छा से सेवा से अनुपस्थित नहीं रहे, बल्कि सरकारी आदेश के कारण नौकरी से बाहर हुए थे। उन्होंने यह भी कहा कि नियुक्तियां रद्द करने वाला आदेश निरस्त हो चुका है और पहले के फैसले के विरुद्ध राज्य सरकार ने कोई अपील दाखिल नहीं की। ऐसे में बहाली तक सीमित राहत देकर वेतन तथा अन्य सेवा लाभ रोकना उचित नहीं है।
हाईकोर्ट ने माना कि पहले के न्यायिक आदेश में परिणामी सेवा लाभ दिए जा चुके हैं, इसलिए राज्य सरकार उसके प्रभाव को सीमित नहीं कर सकती। अदालत के अनुसार सेवा से बाहर रहने की अवधि कर्मचारियों की गलती या स्वैच्छिक अनुपस्थिति का नतीजा नहीं थी। अब आदेश के तहत याचिकाकर्ताओं को उस पूरी अवधि का बकाया वेतन और संबंधित सेवा लाभ आठ सप्ताह के भीतर दिए जाने हैं।