रांची में राज्य सरकार झारनेट-2.0 की क्षमता बढ़ाने की तैयारी कर रही है। प्रस्तावित उन्नयन के बाद झारखंड की करीब 29 हजार वर्ग किलोमीटर वन भूमि का रिकॉर्ड डिजिटल रूप में उपलब्ध कराया जा सकेगा। इसके लिए सूचना प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों से सलाह मांगी गई है।
झारनेट की स्थापना वर्ष 2005 में सरकारी डेटा के संग्रह और ऑनलाइन गतिविधियों के संचालन के लिए की गई थी। भूमि अभिलेख, म्यूटेशन और शिक्षा से जुड़े कई ऑनलाइन काम इसी प्लेटफॉर्म के माध्यम से होते हैं। राज्य सरकार ने दिसंबर 2025 में झारनेट-2.0 मॉडल लागू किया था।
अब सरकार वन भूमि से जुड़े आंकड़ों को भी इस डिजिटल व्यवस्था में शामिल करना चाहती है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इतने बड़े रिकॉर्ड को रखने और संचालित करने के लिए सर्वर की मौजूदा क्षमता पर्याप्त नहीं है। इसी कारण झारनेट-2.0 को अधिक क्षमता वाले ढांचे में बदलने की योजना बनाई जा रही है।
इस पहल का एक प्रमुख उद्देश्य लंबित वनाधिकार आवेदनों की प्रक्रिया को सुगम बनाना है। राज्य में बड़ी संख्या में ऐसे आवेदन लंबित हैं। संबंधित भूमि का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने के कारण कई मामलों में आवेदन का खाते से मिलान नहीं हो पा रहा है। रिकॉर्ड डिजिटल होने पर इस जांच और मिलान में सुविधा मिलने की उम्मीद है।
सूचना प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ मुकेश कुमार के अनुसार, क्षमता बढ़ने से सर्वर पर नए रिकॉर्ड रखने और उनके संचालन में तेजी आती है। उन्नत सर्वर का इस्तेमाल सरकारी सेवाओं को ग्रामीण क्षेत्रों तक अधिक तेजी से पहुंचाने में भी किया जा सकेगा।
राज्य सरकार हाई-स्पीड इंटरनेट कनेक्टिविटी का विस्तार करने की दिशा में भी काम कर रही है। हाल में सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की कई बड़ी कंपनियों को झारखंड में काम करने के लिए आमंत्रित किया गया है। झारनेट-2.0 का नियोजित उन्नयन सरकारी डिजिटल सेवाओं और भूमि संबंधी सूचनाओं के विस्तार के लिए आधार तैयार करेगा।