धनबाद के अंकित राजगढ़िया की नेत्रदान के प्रति वर्षों पुरानी पहल से उनके परिवार और रिश्तेदारी के छह लोगों का मरणोपरांत नेत्रदान कराया जा चुका है। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, इन दान से मिले कॉर्निया के प्रत्यारोपण के बाद 12 लोगों को देखने में मदद मिली। अंकित अब भी परिवार और समाज के लोगों को नेत्रदान के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
इस अभियान की शुरुआत वर्ष 2010 की एक रेल यात्रा से जुड़ी है। उस समय दसवीं कक्षा में पढ़ रहे अंकित प्रतिदिन कतरास से धनबाद आते-जाते थे। ट्रेन में एक नेत्रहीन बच्ची से बातचीत के बाद उन्होंने दृष्टिबाधित लोगों की कठिनाइयों को समझा और नेत्रदान का संकल्प लिया। शहीद निर्मल महतो मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के आई-बैंक में उन्हें बताया गया कि नेत्रदान मृत्यु के बाद ही संभव है।
इसके बाद अंकित ने अपनी मां सरोज राजगढ़िया और भाई सनोज समेत परिवार के सदस्यों से इस विषय पर बात की। उन्होंने स्वयं देहदान का शपथ-पत्र भरा और अपनी मां को भी अंगदान का संकल्प लेने के लिए प्रेरित किया। परिवार से पहला नेत्रदान 2012 में उनके बड़े पापा देवीप्रसाद राजगढ़िया के निधन के बाद रांची के कश्यप मेमोरियल अस्पताल में कराया गया।
वर्ष 2014 में पिता प्रकाशचंद्र राजगढ़िया के निधन के बाद भी नेत्रदान हुआ। इसके बाद 2019 में बिमला राजगढ़िया, 2021 में मामा सुरेश अग्रवाल, 2022 में कमला अग्रवाल और 2025 में चचेरे भाई आलोक राजगढ़िया के निधन के बाद नेत्रदान कराया गया। इस तरह परिवार और रिश्तेदारी के छह सदस्यों की आंखें दान की गईं।
चिकित्सकों के अनुसार, एक नेत्रदाता से दो लोगों को कॉर्निया मिल सकता है। उपलब्ध जानकारी में बताया गया है कि अंकित के परिवार से मिले कॉर्निया के सभी 12 प्रत्यारोपण एसएनएमएमसीएच के आई-बैंक में किए गए। मेडिकल कॉलेज में 2018 से नेत्रदान की व्यवस्था शुरू हुई और अब तक 90 लोगों ने नेत्रदान किया है, जबकि 42 लोगों को कॉर्निया प्रत्यारोपण से लाभ मिला है।
हालांकि चिकित्सकों की कमी के कारण अस्पताल का आई-बैंक पिछले दो वर्षों से बंद है। नेत्र रोग विभाग के अध्यक्ष डॉ. धर्मेंद्र कुमार के मुताबिक, आई-बैंक को फिर शुरू करने के लिए लाइसेंस मिल चुका है। उन्होंने नेत्रदान पंजीकरण के लिए लोगों से आगे आने की अपील की है।