झारखंड में पशुओं की बीमारियों की समय पर पहचान और रोकथाम के लिए प्रयोगशाला तंत्र विकसित करने की तैयारी है। ऑस्ट्रेलिया की मेलबर्न यूनिवर्सिटी ने राज्य के पशुपालन विभाग को तकनीकी सहयोग देने पर सहमति जताई है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत रांची के कांके में एक केंद्रीय प्रयोगशाला बनाने की योजना तैयार की जा रही है।
पशुपालन विभाग के उप निदेशक डॉ. राजीव रंजन और गव्य विभाग के उप निदेशक मनोज कुमार तिवारी का ऑस्ट्रेलिया दौरा नौ से 14 नवंबर तक प्रस्तावित है। इस दौरान दोनों अधिकारी पशु रोगों की रोकथाम में इस्तेमाल होने वाली आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों और उत्पादकता बढ़ाने वाली तकनीकों की जानकारी लेंगे।
विभागीय टीम ऑस्ट्रेलिया में झारखंड के पशुओं में पाई जाने वाली बीमारियों, उपलब्ध तकनीकी क्षमता और पशु चिकित्सालयों की मौजूदा स्थिति का विवरण भी साझा करेगी। इसका उद्देश्य राज्य की जरूरतों के अनुरूप आधुनिक तकनीक के उपयोग की योजना बनाना है। प्रशिक्षण और तकनीकी निरीक्षण के बाद ऑस्ट्रेलिया की एक टीम के झारखंड आने का भी कार्यक्रम है।
राज्य में प्रखंड, जिला और मुख्यालय स्तर पर आधुनिक प्रयोगशालाएं स्थापित करने का प्रस्ताव तैयार हो रहा है। कांके की केंद्रीय लैब में विभिन्न स्थानों से आए नमूनों की जांच और बीमारियों की पहचान की जाएगी। इसकी संरचना का प्रारूप तैयार करने की जिम्मेदारी भवन निर्माण विभाग को दी गई है। प्रखंड स्तर की लैब में छह और जिला स्तर की लैब में करीब दस कमरे प्रस्तावित हैं।
झारखंड में पशुओं की संख्या करीब 1.17 करोड़ बताई गई है। विभाग के अनुसार यहां खुरपका-मुंहपका, भेड़-बकरियों में पीपीआर, ब्रुसेलोसिस और लम्पी जैसी बीमारियां प्रमुख रूप से सामने आती हैं। ब्रुसेलोसिस गाय, भैंस, भेड़, बकरी और सूअर समेत कई पशुओं को प्रभावित कर सकती है तथा इससे मनुष्यों के संक्रमित होने का खतरा भी रहता है।
ऑस्ट्रेलियाई टीम प्रस्तावित प्रयोगशालाओं, रोग नियंत्रण के उपायों और पशु उत्पादन बढ़ाने की संभावनाओं का स्थलीय आकलन करेगी। इसके बाद वह विभाग को रिपोर्ट सौंपेगी। इसी रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई तय होगी। जिला और प्रखंड स्तर की प्रयोगशालाओं में नमूने एकत्र करने के लिए आधुनिक मशीनें लगाने का भी प्रस्ताव है।