पहली पत्नी के जीवित रहते दूसरी पत्नी को अनुकंपा नियुक्ति का अधिकार नहीं: झारखंड हाईकोर्ट

झारखंड हाईकोर्ट ने साहिबगंज के एक पंचायत सेवक से जुड़े मामले में दूसरी पत्नी की अपील खारिज कर दी। अदालत ने सेवा आचरण नियमों और बच्चे के वैधानिक अधिकारों को अलग-अलग माना।

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झारखंड हाईकोर्ट के अनुकंपा नियुक्ति संबंधी फैसले का सांकेतिक दृश्य

झारखंड हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े एक मामले में कहा है कि सरकारी कर्मचारी की पहली पत्नी के जीवित रहते दूसरी पत्नी नौकरी का दावा नहीं कर सकती। चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने मार्था मुर्मू की ओर से दाखिल लेटर पेटेंट अपील खारिज कर दी।

मामला साहिबगंज जिले के बोरियो प्रखंड में पंचायत सेवक रहे बरनवास माल्टू से संबंधित है। उनकी 11 जुलाई 2011 को सेवाकाल के दौरान मृत्यु हो गई थी। इसके बाद अनुकंपा नियुक्ति के लिए उनकी पहली पत्नी सरोजिनी किस्कू और खुद को दूसरी पत्नी बताने वाली मार्था मुर्मू ने अलग-अलग याचिकाएं दाखिल की थीं। पहली याचिका वर्ष 2013 में दायर हुई थी।

मार्था मुर्मू की ओर से दलील दी गई थी कि वह और दिवंगत कर्मचारी संथाल समुदाय से आते हैं तथा समुदाय की प्रथागत व्यवस्था में दूसरी शादी की अनुमति है। इसी आधार पर उन्होंने अनुकंपा नियुक्ति से वंचित नहीं किए जाने का आग्रह किया था। कर्मचारी से जुड़े दस्तावेजों में दोनों महिलाओं का उल्लेख होने की बात भी मामले में सामने आई।

अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी समुदाय के प्रथागत कानून में दूसरी शादी की अनुमति होने पर भी सरकारी कर्मचारी के लिए लागू सेवा आचरण नियमों का पालन आवश्यक है। पहली पत्नी के रहते और सरकार की अनुमति के बिना की गई दूसरी शादी के आधार पर दूसरी पत्नी व्यक्तिगत सेवा लाभ के रूप में अनुकंपा नियुक्ति नहीं मांग सकती।

खंडपीठ ने दूसरी पत्नी से जन्मे नाबालिग बेटे की स्थिति पर अलग से विचार किया। अदालत ने बच्चे को मृत कर्मचारी का प्रथम श्रेणी का कानूनी उत्तराधिकारी माना। इस तरह न्यायालय ने दूसरी पत्नी के अनुकंपा नियुक्ति संबंधी दावे और बच्चे के वैधानिक अधिकारों को एक-दूसरे से अलग रखा।

फैसले से यह सिद्धांत सामने आया कि पारिवारिक प्रथा और सरकारी सेवा से मिलने वाले लाभों के दावों का मूल्यांकन अलग नियमों के आधार पर हो सकता है। साथ ही, माता-पिता की शादी सेवा नियमों के अनुसार विवादित होने मात्र से बच्चे को पिता की संपत्ति या अन्य वैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।