बरहेट में ‘टहनी आने’ की परंपरा निभाने मिट्टी और पत्तों से सजकर पहुंचे श्रद्धालु

साहिबगंज के बरहेट में शारदीय नवरात्र के दौरान आदिवासी श्रद्धालुओं ने मिट्टी, कीचड़ और जंगली पत्तों से सजकर पारंपरिक नृत्य किया और मां दुर्गा के दर्शन किए।

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बरहेट में मिट्टी और जंगली पत्तों से सजकर पारंपरिक अनुष्ठान में शामिल आदिवासी श्रद्धालु

साहिबगंज जिले के बरहेट में शारदीय नवरात्र के अवसर पर आदिवासी समाज की पारंपरिक ‘टहनी आने’ की रस्म निभाई गई। प्रकाशित विवरण के अनुसार, सैकड़ों श्रद्धालु शरीर पर मिट्टी और कीचड़ लगाकर तथा जंगली पत्तों की वेशभूषा धारण कर मां दुर्गा के दर्शन के लिए पहुंचे।

श्रद्धालुओं के समूह ने मांदर, ढोल और नगाड़ों की थाप पर पारंपरिक नृत्य करते हुए पूजा पंडाल की ओर प्रस्थान किया। मिट्टी और पत्तों से सजे प्रतिभागियों तथा पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज ने दुर्गा पूजा मेले में आए लोगों का ध्यान खींचा।

रिपोर्ट में इस परंपरा को करीब 200 वर्ष पुराना बताया गया है। स्थानीय बुजुर्गों के मुताबिक, बरहेट का आदिवासी समाज पीढ़ियों से इस अनुष्ठान को निभाता आ रहा है। शरीर पर मिट्टी-कीचड़ लगाने और जंगली पत्तों को वस्त्र की तरह पहनने को मनुष्य तथा मिट्टी के संबंध के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।

‘टहनी आने’ की परंपरा में संथाल समाज के जल, जंगल और जमीन से जुड़ाव की झलक भी दिखाई दी। अनुष्ठान के दौरान प्रकृति से जुड़े प्रतीकों, सामूहिक नृत्य और पारंपरिक संगीत ने स्थानीय सांस्कृतिक विरासत को सामने रखा। नई पीढ़ी के लोगों ने भी आयोजन में भाग लेकर इस परंपरा को आगे बढ़ाया।

बरहेट के दुर्गा पूजा मेले में इस अनुष्ठान को देखने के लिए स्थानीय निवासियों के साथ दूर-दराज से आए श्रद्धालु भी उपस्थित रहे। पूजा पंडाल के पास पहुंचे पारंपरिक समूह को लोगों ने उत्सुकता से देखा, जबकि मांदर और नगाड़ों की धुन के बीच धार्मिक जयकारे भी लगाए गए।

यह आयोजन बरहेट में दुर्गा पूजा की धार्मिक गतिविधियों के साथ क्षेत्र की आदिवासी सांस्कृतिक पहचान को भी रेखांकित करता है। लंबे समय से चली आ रही रस्म का सार्वजनिक रूप से निर्वाह स्थानीय लोक आस्था, सामुदायिक भागीदारी और प्रकृति-केंद्रित परंपराओं की निरंतरता को दर्शाता है।