भवनाथपुर में 15 रुपये से शुरू हुई दुर्गा पूजा परंपरा ने पूरे किए 64 वर्ष

गढ़वा के भवनाथपुर बस्ती में वर्ष 1962 से दुर्गा पूजा आयोजित हो रही है। सीमित संसाधनों से शुरू हुआ आयोजन अब भव्य रूप ले चुका है, लेकिन इसकी सामुदायिक पहचान कायम है।

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गढ़वा के भवनाथपुर बस्ती में स्थापित दुर्गा मंदिर

गढ़वा जिले के भवनाथपुर प्रखंड मुख्यालय स्थित भवनाथपुर बस्ती में दुर्गा पूजा की परंपरा 64 वर्षों से जारी है। वर्ष 1962 में केवल 15 रुपये के खर्च से आरंभ हुआ यह आयोजन समय के साथ भव्य होता गया। ग्रामीण इसे अपनी आस्था के साथ गांव की ऐतिहासिक विरासत और सामाजिक एकजुटता से भी जोड़ते हैं।

इस पूजा की शुरुआत तत्कालीन मुखिया पारस नाथ सिंह और सरपंच नंद केशरी सिंह की पहल पर हुई थी। आयोजन के लिए हरिहर सिंह ने गांव के बीच अपनी जमीन दी थी। उसी स्थान पर अब दुर्गा मंदिर स्थापित है, जहां हर वर्ष पूजा-अर्चना और संबंधित कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

ग्रामीणों के अनुसार, पहले आयोजन के लिए आपसी सहयोग से चंदा जुटाया गया था। बाद में प्रति हल और प्रति घर पांच रुपये तथा नौकरी करने वाले लोगों से 10 रुपये सहयोग लेने की व्यवस्था बनाई गई। सीमित साधनों के बीच बनी इस सामूहिक व्यवस्था ने पूजा को नियमित रूप से जारी रखने में भूमिका निभाई।

शुरुआती वर्षों में प्रतिमा तैयार करने के लिए तत्कालीन अविभाजित बिहार के तिलौथू से प्रजापति समुदाय के मूर्तिकार भवनाथपुर आते थे। विसर्जन के लिए वाहन उपलब्ध नहीं होते थे, इसलिए ग्रामीण प्रतिमा को कंधों पर उठाकर ले जाते थे। आयोजन की तैयारियां भी मुख्यतः स्थानीय लोगों के सामूहिक प्रयास से पूरी होती थीं।

उस दौर में गांव के युवक ही रामलीला के अलग-अलग पात्र निभाते थे। अब रामलीला के मंचन के लिए बाहर से कलाकार बुलाए जाते हैं। पंडाल, सजावट, प्रतिमा और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का स्वरूप भी विस्तृत हुआ है तथा आयोजन पर अब लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं।

छह दशक से अधिक समय में पूजा की व्यवस्था और संसाधनों में बड़ा बदलाव आया है, लेकिन ग्रामीण भागीदारी इसकी मुख्य पहचान बनी हुई है। भवनाथपुर बस्ती की यह परंपरा नई पीढ़ी को आयोजन की शुरुआत, पूर्वजों के सहयोग और गांव के साझा सांस्कृतिक इतिहास से परिचित कराती है।