झारखंड हाईकोर्ट ने रामगढ़ जिले की भैरवा जलप्रपात परियोजना के लिए अधिग्रहित जमीन का बढ़ा हुआ मुआवजा बरकरार रखा है। अदालत ने मुआवजे में वृद्धि के खिलाफ रामगढ़ उपायुक्त की ओर से दाखिल अपील खारिज कर दी। मामला गोला थाना क्षेत्र के हेरमदगा गांव में अधिग्रहित 0.20 एकड़ जमीन से जुड़ा है।
जस्टिस मनोज प्रसाद की अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा कि रैयतों ने निर्धारित तीन महीने की अवधि में मुआवजा बढ़ाने का आवेदन देने का दावा किया था। राज्य सरकार की ओर से इस दावे का स्पष्ट खंडन नहीं किया गया। अदालत ने माना कि सरकारी कार्यालय की लापरवाही का लाभ सरकार को नहीं दिया जा सकता।
परियोजना के लिए जमीन अधिग्रहण के बाद संबंधित रैयतों को 8,526.89 रुपये प्रति डिसमिल की दर से मुआवजा मिला था। इस राशि से असंतुष्ट रैयतों की अपील पर विशेष भू-अर्जन न्यायालय ने 11 जुलाई 2008 को दर बढ़ाकर 8,923 रुपये प्रति डिसमिल कर दी थी। सरकार ने उस निर्णय को चुनौती नहीं दी थी।
विशेष भू-अर्जन न्यायालय के फैसले को आधार बनाते हुए अन्य रैयतों ने भी धारा 28-ए के तहत अपने मुआवजे में वृद्धि की मांग की। उनका कहना था कि नौ अगस्त 2008 को आवेदन जमा किया गया था, लेकिन वह विशेष भू-अर्जन कार्यालय से गायब हो गया। आवेदन गायब होने के आरोप का भी सरकार की ओर से स्पष्ट खंडन नहीं किया गया।
हाईकोर्ट ने सरकार का समय-सीमा से जुड़ा तर्क स्वीकार नहीं किया। अदालत ने इसी भूमि अधिग्रहण विवाद से संबंधित एक अन्य अपील में पहले दिए गए फैसले का भी उल्लेख किया। इन आधारों पर रामगढ़ उपायुक्त की अपील खारिज कर दी गई और रैयतों के पक्ष में तय बढ़ी हुई मुआवजा दर प्रभावी बनी रही।
इस आदेश का सीधा संबंध हेरमदगा गांव के उन जमीन मालिकों से है, जिनकी भूमि भैरवा जलप्रपात परियोजना के लिए ली गई थी। निर्णय में आवेदन जमा होने के दावे पर सरकारी पक्ष के स्पष्ट जवाब के अभाव और कार्यालयी लापरवाही से रैयतों को नुकसान नहीं पहुंचाने के सिद्धांत को प्रमुख आधार बनाया गया।