पलामू जिले के मनातू प्रखंड में 200 से अधिक महिलाएं मडुआ की खेती के जरिए आजीविका का नया विकल्प तैयार कर रही हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, महिलाओं ने 70 एकड़ से अधिक जमीन पर यह फसल लगाई है। अफीम की अवैध खेती और नक्सली गतिविधियों की चुनौती से जूझते रहे इस क्षेत्र में मोटे अनाज की खेती को बदलाव की पहल के रूप में देखा जा रहा है।
इस प्रयास का उद्देश्य सुदूर गांवों की महिलाओं और अन्य ग्रामीण परिवारों को वैकल्पिक आय से जोड़ना है। खेतों में तैयार हो रही मडुआ की फसल से जुड़ी महिलाओं को उम्मीद है कि खेती का यह तरीका उनके परिवारों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने में मददगार बनेगा। फिलहाल पहल में शामिल महिलाओं की संख्या दो सौ से अधिक बताई गई है।
मनातू के उरुर गांव की किसान सरिता देवी भी इस बार मडुआ उगा रही हैं। वह पहले अरहर और मक्का की खेती करती थीं। उनके अनुसार, मडुआ पौष्टिक अनाज है और परंपरागत खेती से दोबारा जुड़ना क्षेत्र के लिए सकारात्मक साबित हो सकता है। उन्हें इस फसल से बेहतर भविष्य और आय का अतिरिक्त विकल्प मिलने की आशा है।
झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी की मनातू प्रखंड परियोजना प्रबंधक कुमारी नम्रता के अनुसार, दूरस्थ क्षेत्र के ग्रामीण परिवारों को टिकाऊ आजीविका से जोड़ने के लिए मडुआ की खेती को प्रोत्साहित किया जा रहा है। आने वाले समय में इस अभियान में और महिलाओं को शामिल करने की योजना भी है।
मडुआ जैसे मोटे अनाज की खेती इस इलाके के लिए खेती का वैकल्पिक रास्ता प्रस्तुत कर रही है। महिलाओं की भागीदारी के कारण यह पहल केवल फसल उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण स्तर पर आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ाने के प्रयास से भी जुड़ी है। अभी इसकी सफलता का आकलन उपज और उससे होने वाली आय के आधार पर किया जाना बाकी है।
मनातू में शुरू हुआ यह प्रयास दिखाता है कि अवसर और संस्थागत सहयोग मिलने पर ग्रामीण महिलाएं खेती में नए विकल्प अपना सकती हैं। 70 एकड़ से अधिक क्षेत्र में मडुआ की मौजूदा फसल और बढ़ती भागीदारी से स्थानीय परिवारों को नियमित तथा वैध आजीविका उपलब्ध कराने की दिशा में आधार तैयार होने की उम्मीद है।