झारखंड में बालू खनन पर लगी एनजीटी की रोक 16 अक्टूबर से हटने वाली है, लेकिन रांची जिले में बालू की उपलब्धता तुरंत सामान्य होने के आसार नहीं हैं। उपलब्ध विवरण के अनुसार, जिले के सभी 19 बालू घाटों का टेंडर हो चुका है, पर इनमें से केवल तीन घाटों को खनन के लिए जरूरी अनापत्ति और स्वीकृतियां मिली हैं।
सिल्ली क्षेत्र के श्यामनगर, सुंडिल और चोकेसेरेंग घाटों को पर्यावरण स्वीकृति, ग्रामसभा की अनुमति और कंसेंट टू ऑपरेट मिल चुका है। हालांकि श्यामनगर घाट से खनन शुरू होने की संभावना कम बताई गई है। ऐसे में रोक समाप्त होने के बावजूद जिले में प्रभावी रूप से बहुत सीमित घाटों से ही बालू उठाव हो सकेगा।
यह समस्या केवल रांची तक सीमित नहीं है। राज्य में बी श्रेणी के कुल 444 बालू घाट बताए गए हैं, जिनमें अब तक 294 की नीलामी हुई है। नीलामी के बाद भी पर्यावरण स्वीकृति और कंसेंट टू ऑपरेट जैसी प्रक्रियाएं पूरी नहीं होने के कारण अधिकतर घाटों से खनन शुरू नहीं हो पाया है। फिलहाल छह जिलों के केवल 14 घाटों को जरूरी मंजूरियां मिलने की जानकारी दी गई है।
चार महीने की रोक के दौरान पलामू के पांच घाटों का टेंडर हुआ, लेकिन वहां भी अभी खनन शुरू नहीं होगा। धनबाद के सभी 10 बी श्रेणी घाटों का टेंडर पिछले वर्ष हो चुका है, पर जरूरी स्वीकृतियां नहीं मिलने से किसी घाट से उठाव नहीं होगा। हजारीबाग में तीन घाटों से 16 अक्टूबर को काम शुरू होने की बात कही गई है, जबकि नौ घाट मंजूरी की प्रतीक्षा में हैं।
विभागीय अधिकारियों और ठेकेदारों के बीच स्वीकृतियां हासिल करने की जिम्मेदारी को लेकर अलग-अलग बातें सामने आई हैं। खान विभाग के अधिकारियों ने जिलों की भूमिका पर सवाल उठाया है, जबकि रांची के खनन पदाधिकारी के अनुसार जरूरी एनओसी लेना ठेका प्राप्त करने वाले ठेकेदार की जिम्मेदारी है।
सीमित वैध आपूर्ति के कारण रोक हटने का तत्काल लाभ निर्माण कार्य कराने वाले लोगों को मिलना कठिन हो सकता है। उपलब्ध विवरण में रांची में अवैध रूप से बेचे जा रहे 100 घनफुट बालू की कीमत 4,500 रुपये बताई गई है। स्थानीय घाटों से पर्याप्त उठाव नहीं होने पर बिहार से बालू मंगाने और अधिक कीमत चुकाने की स्थिति बने रहने की आशंका जताई गई है।