रामगढ़ जिले की राजरप्पा परियोजना से जुड़े दशकों पुराने भूमि मुआवजा विवाद की अब दोबारा सुनवाई होगी। झारखंड हाई कोर्ट ने अतिरिक्त न्यायिक आयुक्त-सह-ट्रिब्यूनल, रांची के 2018 के आदेश को रद्द करते हुए मूल दावा बहाल कर दिया है। विवाद मौजा सेवई की 18.19 एकड़ भूमि से संबंधित है, जिसका अधिग्रहण 1962 में किया गया था।
न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने अपीलकर्ताओं की ओर से प्रस्तुत अतिरिक्त दस्तावेजों को रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति दी। अदालत के अनुसार ये दस्तावेज विवाद के निष्पक्ष और न्यायपूर्ण निपटारे के लिए महत्वपूर्ण हैं। हाई कोर्ट ने ट्रिब्यूनल को नए साक्ष्यों पर विचार करते हुए मामले में फिर से निर्णय करने का निर्देश दिया है।
अपीलकर्ताओं का दावा है कि संबंधित जमीन उनकी पारिवारिक रैयती भूमि थी। केंद्र सरकार ने 29 दिसंबर 1962 को कोल बेयरिंग एरिया (अधिग्रहण एवं विकास) अधिनियम, 1957 के तहत इसे राजरप्पा परियोजना के लिए अधिग्रहित किया था। नेशनल कोल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के सीसीएल में विलय के बाद मुआवजे की जिम्मेदारी सीसीएल पर आने की बात कही गई है।
मूल दावेदार टिकेंद्र चौधरी के निधन के बाद उनके कानूनी उत्तराधिकारी मुकदमा आगे बढ़ा रहे हैं। उनका कहना है कि अधिग्रहण के बदले मूल दावेदार को नौकरी दी गई थी, लेकिन भूमि का मौद्रिक मुआवजा नहीं मिला। उन्होंने 1989 में जिला भूमि अधिग्रहण अधिकारी द्वारा जमीन को रैयती मान्यता दिए जाने का भी उल्लेख किया है।
ट्रिब्यूनल ने 2018 में आवश्यक फॉर्म-के और संबंधित परचा पेश नहीं किए जाने के आधार पर दावा खारिज कर दिया था। इसके बाद अपीलकर्ताओं ने हाई कोर्ट में परचा, हुकुमनामा, जमींदारी रसीद और अन्य दस्तावेज प्रस्तुत किए। अदालत ने नागरिक प्रक्रिया संहिता के आदेश 41 नियम 27 के तहत अतिरिक्त साक्ष्य स्वीकार किए।
हाई कोर्ट ने पुराने मामले को देखते हुए सुनवाई तेजी से पूरी करने को कहा है। सभी संबंधित पक्षों को 29 सितंबर को सुबह 10:30 बजे ट्रिब्यूनल के समक्ष उपस्थित होने का निर्देश दिया गया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सुनवाई के दौरान कोई पक्ष अनावश्यक स्थगन की मांग नहीं करेगा। अब मुआवजे के दावे पर उपलब्ध पुराने और नए दस्तावेजों के आधार पर ट्रिब्यूनल फैसला करेगा।