रिम्स अध्ययन: झारखंड में स्ट्रोक के 93.7% मरीज साढ़े चार घंटे में अस्पताल नहीं पहुंचते

रिम्स के अध्ययन में 1,562 स्ट्रोक मरीजों की जांच की गई। एक्यूट इस्केमिक स्ट्रोक के 237 मरीजों में केवल 15 निर्धारित साढ़े चार घंटे के भीतर अस्पताल पहुंचे।

2 मिनट पढ़ें 3 बार पढ़ी गई
रांची के रिम्स के अध्ययन में ब्रेन स्ट्रोक मरीजों के अस्पताल पहुंचने में देरी का खुलासा

रांची स्थित राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) के एक अध्ययन में झारखंड के ब्रेन स्ट्रोक मरीजों के इलाज में गंभीर देरी सामने आई है। अध्ययन के अनुसार, 93.7 प्रतिशत मरीज शुरुआती साढ़े चार घंटे के भीतर अस्पताल नहीं पहुंच सके। स्ट्रोक के उपचार में इस अवधि को महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि जांच के बाद पात्र मरीजों को इसी समय-सीमा में थ्रोम्बोलिसिस दिया जा सकता है।

रिम्स के न्यूरोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. सुरेंद्र कुमार के मार्गदर्शन में तन्नू कुमारी, युवराज सिन्हा और उनकी टीम ने वर्ष 2022 से 2024 के बीच यह अध्ययन किया। शोध में कुल 1,562 स्ट्रोक मरीजों की जांच की गई। इसका शोध पत्र न्यूरोलॉजी जर्नल ‘एनल्स ऑफ न्यूरोसाइंसेज’ में प्रकाशित हुआ है।

जांच में दिमाग की नस बंद होने से होने वाले एक्यूट इस्केमिक स्ट्रोक के 237 मरीज शामिल थे। इनमें केवल 15 मरीज निर्धारित साढ़े चार घंटे के भीतर अस्पताल पहुंच पाए, जबकि 222 मरीज समय-सीमा बीतने के बाद पहुंचे। इस हिसाब से लगभग हर 16 मरीजों में केवल एक ही समय पर अस्पताल पहुंच सका।

अध्ययन में मरीजों की सामाजिक और भौगोलिक पृष्ठभूमि का भी विश्लेषण किया गया। इसके मुताबिक, 70 प्रतिशत मरीज ग्रामीण क्षेत्रों से थे और 49 प्रतिशत निरक्षर थे। केवल 14 प्रतिशत लोगों को स्ट्रोक के शुरुआती संकेतों की जानकारी थी, जबकि थ्रोम्बोलिसिस उपचार के बारे में महज 5.5 प्रतिशत लोग जानते थे।

स्ट्रोक के बताए गए शुरुआती लक्षणों में मुंह टेढ़ा होना, हाथ में अचानक कमजोरी महसूस होना और बोलने में परेशानी शामिल हैं। अध्ययन में जागरूकता की कमी को अस्पताल पहुंचने में होने वाली देरी से जुड़ा एक महत्वपूर्ण कारण बताया गया है। समय निकल जाने पर बंद नस को खोलने के लिए दिया जाने वाला जीवनरक्षक उपचार संभव नहीं रह जाता।

इस वर्ष विश्व स्ट्रोक दिवस का विषय ‘द टाइम इज नाउ’ रखा गया है। इसका उद्देश्य लोगों को लक्षणों की समय रहते पहचान और मरीज को बिना देरी अस्पताल पहुंचाने के प्रति जागरूक करना है। अध्ययन के निष्कर्ष झारखंड में खासकर ग्रामीण क्षेत्रों तक स्ट्रोक के संकेतों और समयबद्ध उपचार की जानकारी पहुंचाने की जरूरत को रेखांकित करते हैं।