रांची के रिम्स में हुए एक अध्ययन ने झारखंड में ब्रेन स्ट्रोक के मरीजों को समय पर उपचार मिलने की गंभीर चुनौती सामने रखी है। अध्ययन के मुताबिक, स्ट्रोक के केवल 6.3 प्रतिशत मरीज शुरुआती साढ़े चार घंटे के भीतर सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल पहुंच सके। शेष 93.7 प्रतिशत मरीज इस महत्वपूर्ण समय सीमा के बाद अस्पताल पहुंचे।
शोध में वर्ष 2022 से 2024 के बीच कुल 1,562 स्ट्रोक मरीजों की जांच की गई। इनमें दिमाग की नस बंद होने वाले एक्यूट इस्केमिक स्ट्रोक के 237 मरीज शामिल थे। इस समूह में केवल 15 मरीज साढ़े चार घंटे के भीतर अस्पताल पहुंचे, जबकि 222 मरीज निर्धारित समय बीतने के बाद पहुंचे।
स्ट्रोक के शुरुआती साढ़े चार घंटे को उपचार के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना गया है। अध्ययन में बताया गया कि इस अवधि में अस्पताल पहुंचने वाले पात्र मरीजों को नस खोलने वाले इंजेक्शन से थ्रोम्बोलिसिस उपचार दिया जा सकता है। देर होने पर मरीजों को यह उपचार नहीं मिल पाता।
अध्ययन में शामिल मरीजों की सामाजिक और भौगोलिक स्थिति से भी उपचार में देरी की चुनौती दिखी। शोध के अनुसार, 70 प्रतिशत मरीज ग्रामीण क्षेत्रों से आए थे और 49 प्रतिशत निरक्षर थे। शुरुआती लक्षणों के बारे में केवल 14 प्रतिशत लोगों को जानकारी थी, जबकि थ्रोम्बोलिसिस के विषय में जागरूकता 5.5 प्रतिशत लोगों तक सीमित पाई गई।
स्ट्रोक के जिन संकेतों का अध्ययन में उल्लेख किया गया है, उनमें मुंह का टेढ़ा होना, हाथ में कमजोरी और बोलने में परेशानी शामिल हैं। शोध के निष्कर्ष बताते हैं कि इन लक्षणों की शीघ्र पहचान और मरीज को बिना देर किए अस्पताल पहुंचाना उपचार की संभावना के लिए अहम है।
यह अध्ययन रिम्स के न्यूरोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. सुरेंद्र कुमार के मार्गदर्शन में तन्नू कुमारी, युवराज सिन्हा और उनकी टीम ने किया है। इसे न्यूरोलॉजी जर्नल ‘एनल्स ऑफ न्यूरोसाइंसेज’ में प्रकाशित किया गया है। विश्व स्ट्रोक दिवस की इस वर्ष की थीम ‘द टाइम इज नाउ’ भी समय पर अस्पताल पहुंचने और जागरूकता बढ़ाने की जरूरत पर केंद्रित है।