लोहरदगा दुर्गाबाड़ी में 1936 से कायम बंगाली पूजा परंपरा, धुनुची नृत्य और सिंदूर खेला हैं खास

लोहरदगा की श्री श्री दुर्गाबाड़ी में करीब नौ दशक पुरानी परंपरा के अनुसार बंगाली विधि से दुर्गा पूजा हो रही है। ढाक की थाप पर धुनुची नृत्य और विजयादशमी का सिंदूर खेला इसके प्रमुख आकर्षण हैं।

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लोहरदगा की श्री श्री दुर्गाबाड़ी में स्थापित मां दुर्गा की प्रतिमा

लोहरदगा शहर की श्री श्री दुर्गाबाड़ी में दुर्गा पूजा के अवसर पर श्रद्धालुओं की भीड़ जुट रही है। यहां वर्ष 1936 में शुरू हुई पूजा परंपरा आज भी बंगाली रीति-रिवाज के अनुसार निभाई जा रही है। करीब नौ दशक पुराने इस आयोजन में धार्मिक अनुष्ठानों के साथ बंगाली संस्कृति की विशिष्ट झलक दिखाई देती है। नवरात्र के दौरान शहर के अलावा दूर-दराज के क्षेत्रों से भी लोग दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंच रहे हैं।

दुर्गाबाड़ी के बिजय गोपाल दत्ता के अनुसार, संध्या आरती के समय ढाक की थाप के बीच होने वाला पारंपरिक धुनुची नृत्य आयोजन का प्रमुख आकर्षण है। पूजा के लिए बंगाल से विशेष रूप से ढाक वादकों को बुलाने की परंपरा है और इस वर्ष भी वादक यहां पहुंचे हैं। आरती तथा धुनुची नृत्य के दौरान परिसर में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की मौजूदगी देखी जा रही है।

इस पूजा स्थल पर महाअष्टमी के अनुष्ठान का विशेष महत्व माना जाता है। मां दुर्गा के साथ यहां मां काली, भगवान गणेश और शिवलिंग की भी आराधना की जाती है। दुर्गा पूजा के अतिरिक्त काली पूजा, मनसा पूजा और लक्ष्मी पूजा भी पारंपरिक विधि से आयोजित होती है। इन आयोजनों ने दुर्गाबाड़ी को लोहरदगा के प्रमुख धार्मिक केंद्रों में अलग पहचान दी है।

पूजा के दिनों में मंदिर परिसर और आसपास उत्सव जैसा वातावरण है। श्रद्धालुओं का आना दिन और रात जारी है तथा आसपास अलग-अलग प्रकार की दुकानें भी लगाई गई हैं। धार्मिक कार्यक्रमों और स्थानीय गतिविधियों के कारण पूरा क्षेत्र भक्ति और उत्साह से भरा नजर आ रहा है।

विजयादशमी पर दुर्गाबाड़ी में सिंदूर खेला की परंपरा निभाई जाएगी। इस अवसर पर महिलाएं पहले मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करती हैं और फिर एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं। इसके बाद प्रतिमा का विसर्जन कर मां दुर्गा को विदाई दी जाती है। इस तरह लोहरदगा की दुर्गाबाड़ी में पूजा, पारंपरिक कला और सामुदायिक सहभागिता का पुराना सिलसिला इस वर्ष भी जारी है।