हजारीबाग जिले के करियातपुर गांव में पुराने कांसा और पीतल को दोबारा उपयोग में लाकर नए बर्तन बनाने की परंपरा स्थानीय आजीविका का प्रमुख साधन बनी हुई है। यहां 200 से अधिक परिवार इस काम से जुड़े हैं। अनुपयोगी और टूटे बर्तनों को गलाकर कारीगर उन्हें चमकदार नए उत्पादों का रूप देते हैं।
गांव में बर्तन निर्माण का काम कई पीढ़ियों से चल रहा है। कारीगरों के अनुसार, उन्होंने यह हुनर अपने परिवार के बुजुर्गों से सीखा और अब अगली पीढ़ी को इसका प्रशिक्षण दे रहे हैं। इस तरह रोजगार उपलब्ध कराने के साथ ही कांसा-पीतल के बर्तन बनाने की पारंपरिक कला भी आगे बढ़ रही है।
इस व्यवसाय की खासियत इसकी पुनर्चक्रण आधारित प्रक्रिया है। जिन पुराने या टूटे कांसा-पीतल के सामान का सामान्य तौर पर उपयोग नहीं होता, उन्हें स्थानीय कारीगर खरीदते हैं। धातु को गलाने और कई चरणों की मेहनत के बाद उससे दोबारा उपयोग योग्य नए बर्तन तैयार किए जाते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, करियातपुर में एक हजार से अधिक युवा इस पेशे से जुड़े हैं और इसके माध्यम से प्रत्यक्ष रोजगार पा रहे हैं। इसके अतिरिक्त धातु की खरीद, बर्तनों के निर्माण और उन्हें बाजार तक पहुंचाने से संबंधित गतिविधियों में भी बड़ी संख्या में लोगों को अप्रत्यक्ष काम मिलता है।
कारीगर बताते हैं कि पहले बर्तन मुख्य रूप से हाथ से बनाए जाते थे, जबकि अब निर्माण प्रक्रिया में बड़ी मशीनों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। इसके बावजूद बर्तन तैयार करने में मेहनत और पारंपरिक कौशल की महत्वपूर्ण भूमिका बनी हुई है। घरेलू स्तर पर शुरू हुआ यह काम धीरे-धीरे बड़े व्यवसाय का रूप ले रहा है।
करियातपुर के तैयार बर्तन झारखंड के साथ देश के दूसरे हिस्सों तक भी भेजे जाते हैं। स्थानीय युवा रोजगार के लिए बाहर जाने के बजाय गांव में रहकर अपने पुश्तैनी हुनर को आजीविका का आधार बना रहे हैं। इससे गांव की आर्थिक गतिविधि और पारंपरिक धातु शिल्प—दोनों को सहारा मिल रहा है।