रांची में झारखंड हाईकोर्ट ने मलेरिया टेक्निकल सुपरवाइजर और कालाजार टेक्निकल सुपरवाइजर के रूप में लंबे समय से संविदा पर कार्यरत 11 कर्मचारियों की सेवा नियमित करने का निर्देश दिया है। जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने राज्य सरकार से नियमित पद सृजित कर आवश्यक आदेश जारी करने को कहा है। इसके लिए आदेश की प्रति मिलने से 12 सप्ताह का समय निर्धारित किया गया है।
अदालत ने स्वास्थ्य विभाग के 28 अप्रैल 2025 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें इन कर्मचारियों के नियमितीकरण और समायोजन की मांग अस्वीकार की गई थी। फैसला 15 अक्टूबर 2026 को सुनाया गया। नियमित एमटीएस और केटीएस पद उपलब्ध नहीं होने पर कर्मचारियों को मलेरिया इंस्पेक्टर के स्वीकृत रिक्त पदों पर नियमित करने का निर्देश है। जरूरत पड़ने पर सरकार को अतिरिक्त सुपरन्यूमेरेरी पद बनाने होंगे।
ये कर्मचारी राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम के तहत अलग-अलग विज्ञापनों के माध्यम से वर्ष 2008 से 2012 के बीच नियुक्त हुए थे। मलेरिया और कालाजार की रोकथाम से जुड़े कार्यों की निगरानी उनकी जिम्मेदारी रही है। उनके अनुबंध हर वर्ष बढ़ाए गए और उन्होंने लगातार 14 से 18 वर्ष तक सेवा दी। अदालत ने इस लंबी सेवा को काम की स्थायी आवश्यकता का संकेत माना।
मामले में यह तथ्य भी सामने आया कि इसी कार्यक्रम के मल्टीपर्पज वर्कर पुरुष कर्मचारियों के लिए 2,150 पद सृजित करने और उन्हें नियमित वेतनमान देने की प्रक्रिया शुरू की गई थी। इसके विपरीत उनके काम की निगरानी करने वाले एमटीएस और केटीएस कर्मियों के लिए वैसी व्यवस्था नहीं की गई। अदालत ने इस अंतर को अनुचित और संविधान के अनुच्छेद 14 तथा 16 के विपरीत माना।
हाईकोर्ट के अनुसार, नियमितीकरण का लाभ कर्मचारियों को उनकी प्रारंभिक नियुक्ति की तारीख से मिलेगा। वरिष्ठता और पेंशन संबंधी लाभों के लिए सेवा की निरंतरता मानी जाएगी तथा वेतन का काल्पनिक निर्धारण भी शुरुआती नियुक्ति से होगा। हालांकि वास्तविक आर्थिक लाभ फैसले की तारीख से देय होंगे।
याचिका लंबित रहने के दौरान मृत हुए बिरेंद्र प्रसाद को भी प्रारंभिक नियुक्ति की तारीख से नियमित माना जाएगा। आदेश के अनुसार, उनके कानूनी उत्तराधिकारी को नियमों के तहत अंतिम भुगतान और अन्य लाभ दिए जाएंगे। अदालत ने तय अवधि में निर्देश का पालन नहीं होने की स्थिति को गंभीरता से लेने की चेतावनी भी दी है।