आईआईटी आईएसएम धनबाद को पर्यावरण-अनुकूल बांध निर्माण तकनीक का भारतीय पेटेंट

नई तकनीक में बांध के कोर के लिए प्राकृतिक मिट्टी के साथ फ्लाई ऐश और चूने का मिश्रण इस्तेमाल किया गया है। शोधकर्ता अब इसकी आर्थिक और व्यावहारिक क्षमता का मूल्यांकन करेंगे।

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आईआईटी आईएसएम धनबाद की फ्लाई ऐश और चूना आधारित बांध निर्माण तकनीक

धनबाद स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान आईआईटी आईएसएम के सिविल इंजीनियरिंग विभाग को मिट्टी के बांध बनाने की नई पर्यावरण-अनुकूल तकनीक के लिए भारतीय पेटेंट मिला है। शोध टीम ने इस तकनीक को “अर्थन डैम स्ट्रक्चर विद कॉम्पैक्टेड क्ले-फ्लाई ऐश-लाइम कोर” नाम दिया है। भारत सरकार के पेटेंट कार्यालय ने इसे पेटेंट संख्या 601531 प्रदान की है।

इस तकनीक का केंद्र बांध का वह मुख्य हिस्सा है जो पानी के रिसाव को नियंत्रित करने में भूमिका निभाता है। इसमें प्राकृतिक मिट्टी के साथ ताप विद्युत संयंत्रों से निकलने वाली फ्लाई ऐश मिलाई जाती है। चूने की सहायता से तैयार मिश्रण को स्थिर किया जाता है। शोध दल के अनुसार, इस मिश्रित सामग्री से बांध की संरचना को मजबूती और स्थिरता मिल सकती है।

नई व्यवस्था का उद्देश्य बांध निर्माण में प्राकृतिक मिट्टी की खपत घटाना और फ्लाई ऐश का उपयोग बढ़ाना है। यह तकनीक उन क्षेत्रों में उपयोगी हो सकती है जहां बांध के लिए उपयुक्त प्राकृतिक मिट्टी सीमित मात्रा में उपलब्ध है, जबकि फ्लाई ऐश पर्याप्त मात्रा में मिलती है। हालांकि, बड़े स्तर पर इस्तेमाल से पहले इसके आर्थिक प्रभाव और व्यावहारिक क्षमता का विस्तृत आकलन किया जाएगा।

संस्थान के अनुसार, यह अनुसंधान किसी बाहरी वित्तीय सहायता के बिना अपने संसाधनों से पूरा किया गया। पीएचडी कार्यक्रम के अंतर्गत शोध मई 2025 में शुरू हुआ और छह महीने में पूरा हुआ। पेटेंट की वैधता आवेदन की तारीख से 20 वर्ष निर्धारित की गई है।

तकनीक विकसित करने वाली चार सदस्यीय टीम में शोधकर्ता सुबोध श्रीवास्तव, एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. विश्वनाथ एन. खत्री, पूर्व शोध छात्र और बीआईटी मेसरा के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. आशेष बनर्जी तथा पूर्व विभागाध्यक्ष दिवंगत डॉ. श्रीनिवास पसुपुलेटी शामिल रहे। दल ने डॉ. पसुपुलेटी के शोध योगदान को भी स्मरण किया, जिनका निधन 9 जून 2026 को हुआ था।

अगले चरण में शोधकर्ता मिट्टी, फ्लाई ऐश और चूने के अलग-अलग अनुपात से बने मिश्रणों की वहन क्षमता और लंबे समय के व्यवहार का अध्ययन करेंगे। इन परीक्षणों से यह समझने में सहायता मिलेगी कि प्रस्तावित सामग्री वास्तविक परिस्थितियों में कितनी टिकाऊ और उपयोगी रह सकती है। फील्ड परीक्षण तथा मूल्यांकन पूरा होने के बाद ही व्यापक उपयोग की दिशा स्पष्ट होगी।