गढ़वा जिले में सितंबर के अंतिम दिनों के दौरान लगातार तीन दिन हुई बारिश ने सूखने की ओर बढ़ रही खरीफ फसलों को राहत दी है। इसका सबसे अधिक लाभ धान को मिलने की उम्मीद है। बालियां निकलने और दाने भरने के चरण में पहुंची फसल के लिए इस समय पर्याप्त नमी जरूरी है और बारिश के बाद खेतों में नमी लौट आई है।
जून-जुलाई के कमजोर मानसून तथा सितंबर में बारिश के लंबे अंतराल के कारण ऊपरी जमीन वाले खेत तेजी से सूख रहे थे। धुरकी सहित कई क्षेत्रों में किसानों ने मोटर और डीजल पंप से धान की सिंचाई शुरू कर दी थी। नई बारिश के बाद फिलहाल पटवन की जरूरत कम हुई है, जिससे डीजल, बिजली और मजदूरी पर होने वाला खर्च घटने की उम्मीद है।
जिले में इस वर्ष 31 अगस्त तक करीब 47,940 हेक्टेयर में धान की रोपनी दर्ज की गई थी। यह निर्धारित क्षेत्र का लगभग 87.98 प्रतिशत है। इसके बाद भी रोपनी जारी रही, लेकिन बारिश का वितरण समान नहीं होने के कारण खेतों की नमी बनाए रखना किसानों के लिए चुनौती बना हुआ था। ताजा पानी अब दाना भरने के दौरान फसल के काम आएगा।
हालांकि, इस बारिश से खरीफ मौसम की पूरी कमी की भरपाई नहीं होगी। मड़ुआ के लिए 3,400 हेक्टेयर का लक्ष्य तय था, जबकि सितंबर के अंत तक केवल 13.24 प्रतिशत क्षेत्र में इसकी खेती हो सकी। जिन फसलों की समय पर बुआई नहीं हुई, उन्हें बाद में हुई बारिश का फायदा सीमित रहने की संभावना है।
बारिश से बची मिट्टी की नमी धान की कटाई के बाद रबी की शुरुआती तैयारी में भी सहायक हो सकती है। गेहूं, चना, मसूर और सरसों की खेती के लिए यह नमी उपयोगी रहेगी। फिर भी रबी की पूरी स्थिति अक्टूबर-नवंबर में होने वाली बारिश और उपलब्ध सिंचाई सुविधाओं पर निर्भर करेगी।
निचले खेतों में किसानों को अतिरिक्त पानी की स्थिति पर नजर रखने की जरूरत है। लंबे समय तक जलजमाव रहने से धान की जड़ों को नुकसान पहुंचने और रोग का खतरा बढ़ सकता है। जहां पानी जरूरत से अधिक जमा है, वहां निकासी करनी होगी, जबकि पर्याप्त नमी वाले खेतों में अभी सिंचाई टाली जा सकती है।