चक्रधरपुर की प्रियम गुप्ता डिजिटल अभिलेख में सहेज रहीं लोकगीत और मौखिक परंपराएं

बायोटेक्नोलॉजी की पढ़ाई कर चुकीं चक्रधरपुर की प्रियम गुप्ता लोकगीतों, लिपियों, शिल्प और मौखिक इतिहास को दर्ज करने के साथ कलाकारों व शोधकर्ताओं का नेटवर्क तैयार कर रही हैं।

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चक्रधरपुर की प्रियम गुप्ता लोक संस्कृति के डिजिटल संरक्षण पर काम कर रही हैं

पश्चिमी सिंहभूम के चक्रधरपुर की प्रियम गुप्ता भारत की लोक विरासत को डिजिटल माध्यम से सहेजने की दिशा में काम कर रही हैं। बायोटेक्नोलॉजी इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद उन्होंने प्रयोगशाला-केंद्रित पेशे के बजाय लोकगीतों, भाषाओं, शिल्प और मौखिक इतिहास के दस्तावेजीकरण को अपना कार्यक्षेत्र बनाया। इंटरनेट पर वह अलग-अलग क्षेत्रों की परंपराओं और उनके सामाजिक संदर्भों को सामने ला रही हैं।

लोक संस्कृति में उनकी रुचि की नींव संयुक्त परिवार में बीते बचपन के दौरान पड़ी। दीपावली, छठ, बसेड़ा और बचबरस जैसे अवसरों पर परिवार तथा मोहल्ले की सामूहिक भागीदारी ने उन्हें परंपराओं को समझने के लिए प्रेरित किया। बाद में असम के गुंजुंग गांव की यात्रा उनके काम के लिए महत्वपूर्ण मोड़ बनी, जहां ग्रामीणों को एक लोकगीत का अर्थ मालूम नहीं था और उसे जानने वाले बुजुर्ग बहुत कम रह गए थे।

इसके बाद प्रियम ने लुप्त हो रहे गीतों, भाषाओं और पीढ़ियों से चले आ रहे मौखिक ज्ञान को व्यवस्थित ढंग से दर्ज करने पर ध्यान केंद्रित किया। उनके द्वारा संकलित एक लोककथा पर बनी फिल्म ‘ह्यूमंस इन द लूप’ को बाद में नेटफ्लिक्स पर स्थान मिला। उनके सोशल मीडिया खाते से 68 हजार से अधिक लोग जुड़े हैं और उनके प्रयासों को विभिन्न राष्ट्रीय मंचों पर भी सराहना मिली है।

प्रियम ने बंजारा समुदाय के आभूषण ‘धोलना’ जैसी कम दर्ज विरासत को सामने लाने का प्रयास किया। एक अनुयायी ने अपनी दादी का धोलना उन्हें उपलब्ध कराया था। पहाड़ी क्षेत्रों की लुप्तप्राय टांकरी लिपि सीखने के लिए उन्होंने सौ से अधिक लोगों को एक संस्थान से जोड़ने में मदद की। जम्मू के स्थानीय कृषि उत्सव ‘रूत रहदे’ की जानकारी भी उन्होंने युवाओं तक पहुंचाई।

अब वह तीन प्रमुख योजनाओं पर काम कर रही हैं। इनमें विभिन्न क्षेत्रों के भोजन, संगीत, कविता और कहानियों पर आधारित ‘कल्चर पार्टी’, भाषाविदों व लोक कलाकारों से लेकर बुजुर्गों, इतिहासकारों और शोधकर्ताओं तक का नेटवर्क तथा देशभर के हथकरघा कारीगरों, शिल्पकारों और लोक संगीतकारों से जुड़ा जीवंत अभिलेखागार शामिल है। प्रस्तावित आयोजनों में झारखंड के स्थानीय भोजन और मौखिक कथाओं को भी जगह देने की योजना है।

उनका उद्देश्य इस सांस्कृतिक ज्ञान को युवाओं तक पहुंचाने के लिए पर्यटन, संस्कृति और शिक्षा विभागों के साथ काम करना भी है। इस पहल में केवल गीतों का संग्रह नहीं, बल्कि उनसे जुड़ी भाषा, कृषि, भोजन, त्योहार और सामुदायिक स्मृतियों को उनके संदर्भ सहित दर्ज करने पर जोर है। इस तरह चक्रधरपुर से शुरू हुई उनकी यात्रा अलग-अलग भारतीय समुदायों की विरासत को नई पीढ़ी के लिए सुलभ बनाने की कोशिश बन गई है।