रांची में झारखंड हाईकोर्ट ने चीफ इंजीनियर पद पर पदोन्नति के लिए 50 प्वाइंट आरक्षण रोस्टर लागू करने के राज्य सरकार के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने सरकार के 12 मार्च 2024 के संकल्प संख्या 1977 को आरक्षण के संबंध में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय सिद्धांतों के अनुरूप माना।
अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि सरकार के संकल्प में किसी तरह की अवैधता या मनमानी दिखाई नहीं देती। कोर्ट के अनुसार, रोस्टर को क्रमवार लागू करने का निर्णय आरक्षण कानून के दायरे में है। इस व्यवस्था में 50 पद पूरे होने पर 13 पद अनुसूचित जनजाति और पांच पद अनुसूचित जाति के लिए निर्धारित होते हैं।
फैसले में स्पष्ट किया गया कि यह संख्या अनुसूचित जनजाति के लिए 26 प्रतिशत और अनुसूचित जाति के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण के अनुरूप है। इसी आधार पर अदालत ने 50 प्वाइंट रोस्टर की वैधानिकता पर उठाई गई आपत्ति स्वीकार नहीं की।
याचिका ग्रामीण कार्य विभाग में सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर के पद पर कार्यरत सुबोध पासवान ने दाखिल की थी। उपलब्ध विवरण के अनुसार, उनकी नियुक्ति 1995 में सड़क निर्माण विभाग में अनुसूचित जाति श्रेणी के तहत सहायक अभियंता के रूप में हुई थी। वर्ष 2022 में उन्हें कार्यपालक अभियंता और जनवरी 2024 में सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर बनाया गया।
याचिकाकर्ता का पक्ष था कि करीब 27 वर्ष की सेवा और पिछली पदोन्नतियों के बाद वह चीफ इंजीनियर पद पर पदोन्नति के पात्र हैं। हालांकि, अदालत ने सरकार द्वारा निर्धारित रोस्टर व्यवस्था को कानूनसम्मत मानते हुए पदोन्नति की मांग से जुड़ी चुनौती को खारिज कर दिया।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि सेवा शर्तों, कैडर व्यवस्था और पदोन्नति से संबंधित नीतियां बनाना सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है। न्यायिक समीक्षा के दौरान अदालत का दायरा नीति की वैधानिकता की जांच करना है, न कि यह तय करना कि सरकार कोई दूसरी या बेहतर नीति बना सकती थी।