झारखंड में खाद्यान्न उत्पादन 7.4 मिलियन टन तक पहुंचा, मछली और दूध उत्पादन भी बढ़ा

राज्य में खाद्यान्न उत्पादन 3.5 मिलियन टन से बढ़कर करीब 7.4 मिलियन टन हो गया है। मछली, दूध, दलहन और पशुपालन के क्षेत्र में भी उत्पादन तथा स्वरोजगार बढ़ाने के प्रयास जारी हैं।

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झारखंड में कृषि और संबद्ध क्षेत्रों के बढ़ते उत्पादन का सांकेतिक दृश्य

रांची से सामने आई जानकारी के अनुसार झारखंड कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों में दूसरे राज्यों पर अपनी निर्भरता कम करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। राज्य का कुल खाद्यान्न उत्पादन 3.5 मिलियन टन से बढ़कर करीब 7.4 मिलियन टन पहुंच गया है। धान, दलहन, दूध और मछली के उत्पादन में हुई वृद्धि को इस बदलाव का प्रमुख आधार बताया गया है।

राज्य में धान की खेती का क्षेत्र वर्ष 2000 के करीब 10 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 18 लाख हेक्टेयर हो गया है। प्रति हेक्टेयर औसत उपज भी बढ़कर तीन टन तक पहुंची है। इसी अवधि में दलहन की खेती का दायरा एक लाख हेक्टेयर से बढ़कर आठ लाख हेक्टेयर होने की जानकारी दी गई है।

खेती में प्रमाणित बीज, ड्रिप सिंचाई, मल्चिंग और सौर ऊर्जा से चलने वाले सिंचाई पंपों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। किसानों को प्रमाणित बीजों पर 50 से 100 प्रतिशत तक अनुदान देने और बीज वितरण व्यवस्था को ब्लॉकचेन से जोड़ने का उल्लेख भी किया गया है। धान की कटाई के बाद खाली रहने वाली जमीन पर रबी एवं दूसरी फसलें उगाने पर जोर है।

डेयरी क्षेत्र में मेधा ब्रांड के माध्यम से प्रतिदिन करीब 2.50 लाख लीटर दूध एकत्र किया जा रहा है। शुरुआत में यह मात्रा लगभग 11 हजार लीटर प्रतिदिन थी। दूध उत्पादकों को पांच रुपये प्रति लीटर प्रोत्साहन राशि दी जाती है और करीब 66 हजार किसान झारखंड मिल्क फेडरेशन से जुड़े बताए गए हैं।

मछली उत्पादन में राज्य अपनी आवश्यकता का 95 प्रतिशत से अधिक हिस्सा पूरा कर रहा है। उत्पादन करीब 3.63 लाख मीट्रिक टन बताया गया है और इस क्षेत्र से लगभग दो लाख किसान जुड़े हैं। केज कल्चर, बायोफ्लॉक, आधुनिक हैचरी, फिश फीड मिल, कोल्ड चेन और प्रसंस्करण इकाइयों के विस्तार की दिशा में भी प्रयास चल रहे हैं।

पशुपालन को ग्रामीण रोजगार से जोड़ने के लिए बकरी और सूकर पालन इकाइयों पर 70 प्रतिशत अनुदान का प्रावधान बताया गया है। इसके साथ ही 10 जिलों की पांच हजार ग्रामीण महिलाओं को लेयर पोल्ट्री इकाइयों से जोड़ने की योजना है। इन पहलों का उद्देश्य उत्पादन बढ़ाने के साथ ग्रामीण युवाओं, महिलाओं, स्वयं सहायता समूहों और पशुपालकों के लिए आय के अवसर तैयार करना है।